Saturday, 22 March 2014

बहू से बन जाएंगी 'रानी'

नए परिवार के सदस्यों के बर्थडे, एनिवर्सरी और अन्य महत्वपूर्ण तिथियों व त्योहारों को अवश्य याद रखें। ऐसे सभी मौकों को उसी उत्साह के साथ सेलिब्रेट करें जैसे आप अपने घर में करती थीं। जिस तरह भी संभव हो, परिवार के सभी सदस्यों के साथ जुड़ाव स्थापित करने की कोशिश करें। यदि उन्हें किसी प्रकार की मदद की आवश्यकता हो तो मदद की पेशकश करें। ऐसे अवसर पैदा करें कि दोनों परिवार और रिश्तेदार एक साथ अच्छा समय बिता सकें। अपने समय को इस प्रकार नियोजित करें कि कॅरियर और रिश्तेदारों, परिवार व मित्रों के साथ संबंधों में बना रहे सामंजस्य।
2. परिवार के प्रत्येक सदस्य का सम्मान करें और उनके प्रति फिक्रमंद रहें। सभी से नम्रता से बात करें और जहां तक संभव हो मुस्कराहट बिखेरने की कोशिश करें।
3. अन्य रिश्तेदारों का भी स्वागत करें। जलन, क्रोध और संशय को अपने व्यवहार में स्थान न दें।
4. नि:संदेह महिलाएं पुरुषों के समकक्ष हैं, पर इसका यह अर्थ नहीं कि आप आक्रामक हो जाएं या दूसरों का दिल दुखाने वाले कड़वे बोल बोलने लगें। हमेशा अपनी ही बात को आगे रखने के बजाय दूसरों का पक्ष भी सुनने और समझने का प्रयास करें।
5. अकेले प्रयास की तुलना में साझा प्रयास हमेशा अधिक कारगर होते हैं। इस फार्मूले को अपनी पारिवारिक जिंदगी में भी लागू कर सकती हैं। परिवार में भी सदस्यों को एक टीम की
तरह अपने साथ जोड़ते हुए कार्य करेंगी तो सफलता निश्चित है।
6. रुचियों और शौक को अपने दोनों परिवारों के साथ मिलकर एंजॉय करें। इससे परिवार के सदस्यों को आप अपने और करीब ला सकेंगी।
7. अतीत की अप्रिय यादों को भुला देना ही बेहतर होता है। रिश्तों में पुरानी अनबन और तनाव को अपने वर्तमान पर हावी न होने दें। आपके दिलोदिमाग के साथ ही इसका सीधा असर आपके चेहरे पर भी पड़ता है। याद रखें यदि आपका मन साफ और उदार है तो उसका ओज आपके चेहरे पर आएगा। अपने आसपास मौजूद लोगों को जोड़ने का प्रयास करें, न कि उनमें दरार लाएं। अपने अहं के कारण एक-दूसरे से दूर जाने के बजाय बातचीत के जरिए मतभेदों को दूर करने का प्रयास करें।
8. पति के अभिभावकों की पृष्ठभूमि के बारे में रुचिकर बातें जानने का प्रयास करें। उन्हें भी यह जानकर अच्छा लगेगा कि आप यह जानती हैं कि उनकी शिक्षा कहां हुई और कॅरियर में उन्होंने क्या उपलब्धियां हासिल की हैं। थोड़ी बहुत उनकी भाषा सीखने की कोशिश करें। इस प्रकार आप उनसे खूबसूरत रिश्ता जोड़ सकेंगी। उनके लिए उपहारों का चयन करते वक्त समझदारी और फिक्र दिखाएं। उनके सवालों का शालीनता और मुस्कराहट के साथ जवाब दें। आपके परिवार, शिक्षा और विभिन्न मुद्दों पर आपकी राय जानने को लेकर उनमें उत्सुकता हो सकती है। उनकी इस उत्सुकता को खारिज न करें, क्योंकि उनके दिल तक पहुंचने का यह एक सेतु है, जिसका निर्माण आप खुद करेंगी।
9. इस बात का ख्याल रखें कि परिवार में विभिन्न आयु वर्ग के भाई, बहनें, भतीजे, भतीजियां और कुछ मामलों में पति की पहली शादी से बच्चे भी मौजूद होंगे। उन सभी को प्यार देना और उनका ख्याल रखना आपका दायित्व होगा।

60 प्लस का बटुआ

श्रीमती ममता आज साठ साल की पूरी हो रही हैं। वह एक आम गृहिणी हैं, उन्होंने कभी नौकरी नहीं की, पर आज भी उनकी आवाज कड़क है.. मन में सुरक्षा की अहसास है.. बहू की प्यारी सासू मां और पोते-पोतियों की प्यारी दादी है, क्योंकि आज भी उनकी पर्स भारी है अर्थात बैंक की पासबुक में छह अंकों में राशि चढ़ी है। श्रीमती ममता की मां ने उनको तमाम हुनर दिये, लजीज खाना बनाने से लेकर सिलाई-कढ़ाई तक, पर उन्होंने सबसे बड़ा पाठ जो अपनी मां से सीखा वह था वित्तीय अनुशासन।
गृहिणी का
वित्तीय अनुशासन
गृहिणी के वित्तीय अनुशासन का सीधा फंडा है कि आप कमा नहीं सकते, पर बचा तो सकते हैं। ममता जी ने यही फंडा अपनाया..। उन्होंने बचत के दो तरीके ईजाद किए एक तरीका तो घर के रोजमर्रा के खर्चो में किफायत और जरूरत की चीजों को एक मुश्त थोक में खरीदकर पैसा बचाने का था और दूसरा तरीका उस बचत को सही तरीके से निवेश कर ब्याज में लाभ कमाने का था।
बचत का लेखा-जोखा
जरूरी है
श्रीमती ऊषा की डायरी बड़े काम की है, उसमें वह हर माह तीन कालम बनाती हैं। पहले कालम में महीने में खरीदी जाने वाली वस्तुओं की सूची, दूसरे में घर बैठे अगर चीजें मिलें तो उसकी खुदरा दर और तीसरे कालम में उनके द्वारा वास्तव में व्यय की जाने वाली राशि। वह अपने पति से घर बैठे चीजें सप्लाई का पैसा वसूलती हैं। इसमें पति को भी कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि अगर वह उन वस्तुओं को खरीदते तो ज्यादा पैसा चुकाकर ही खरीदते और ऊपर से क्वालिटी और समय की जहमत अलग से।
श्रीमती नुपुर कंप्यूटर में एक्सल के जरिये मासिक बचत का बाकायदा चार्ट बनाती हैं। इससे उनका लेखा-जोखा आसानी से हो जाता है और कंप्यूटर का भी कुछ उपयोग घर की बचत के लिए हो जाता है। नुपुर बहुत से बिलों जैसे बिजली, मोबाइल, केबल कनेक्शन इत्यादि का भुगतान अब ऑन लाइन कर देती हैं। इससे रिक्शा भाड़ा में जो बचत होती है, उसे भी वह अपनी बचत में शामिल कर लेती हैं।
बचत का निवेश
ज्यादा जरूरी है
श्रीमती दुर्गा को बचत में तो महारथ हासिल थी। वह पैसा बचाने के लिए भारी-भरकम थैला सब्जी मंडी और किराना बाजार से लाद लाती थीं, पर बचाए गए रुपयों को गद्दे के नीचे या अलमारी में साड़ी की तह में रखती थीं। पति को जरा सा भी पैसे की जरूरत महसूस होने पर पूरी बचत एक झटके में उनको अर्पित कर अपने को कृतार्थ समझती थीं।
आपका रिटायरमेंट प्लान
पति के रिटायरमेंट के
समानांतर होना चाहिए
श्रीमती दुर्गा जानती थीं कि पति की सेवानिवृत्ति के बाद एक तो उनको मिलने वाले निजी खर्च के रुपये बंद हो जायेंगे और दूसरे घर के बजट को सुनियोजित तरीके से बनाकर और कुछ व्ययों में कटौती करके 'हाथ की सफाई' के जरिये जो पैसे वह हर माह बचाती हैं, उनमें भी कटौती हो जायेगी। इसकी भरपाई के लिए पति को आर्थिक सम्बल देने के लिए उन्होंने पति के रिटायरमेन्ट प्लान के समानांतर अपना भी रिटायरमेंट प्लान तैयार कर रखा है।

इंतजार सही तकरार नही

शोखियों, शरारतों और शहनाइयों के इस मौसम में रूमानी गुलाबों का खिलना सभी देखते हैं, लेकिन फिलहाल तो आरती अरोड़ा को कांटों की तीखी चुभन महसूस हो रही है। वे अपनी छोटी मौसेरी बहन की शादी में बड़े मन से गई हुई थीं पर वहां रिश्ते की चाचियों-आंटियों ने अपना बेहद फेवरिट और आरती को उतना ही नापसंद 'हाय, तेरी उमर निकलती जा रही है' का टॉपिक छेड़ दिया। औरतों की इस बहस में आरती के ओहदे की तो जैसे कोई वैल्यू ही नहींथी और उनके बत्तीसों दांत केवल उसकी बत्तीस साल की उम्र के पीछे पड़े थे। पेशे से इन्वेस्टमेंट बैंकर आरती कहती हैं, ''मैं सुंदर हूं, सफल हूं, आत्मनिर्भर हूं लेकिन मेरी पहली प्राथमिकता शादी नहीं, कॅरियर थी। अब मैं भी शादी करना चाहती हूं पर मुझे कोई कमिटेड और मैच्योर मेंटलिटी का मैच नहीं मिल रहा तो मैं क्या करूं? 'कुंवारी बैठी है' सरीखी टिप्पणियां सुनकर कभी-कभी तो इतनी खीझ होती है कि अपनी किसी विदेशी ब्रांच में ट्रांसफर लेने का मन करता है।''
..पर दिलचस्प बात यह है कि ऐसा केवल भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में होता है। कुछ वक्त पहले एक ब्रिटिश समाचारपत्र में लेखिका हेलेन फील्डिंग का कॉलम बेहद लोकप्रिय था जिसमें वे तीस साल की उम्र पार कर चुकी एक अकेली महिला के अनुभव लिखती थीं। आज उस कॉलम को दुनिया बेस्टसेलर किताब ब्रिजेट जोन्स डॉयरी के नाम से जानती है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इन परिस्थितियों का सामना करने वाली आरती अकेली नहीं हैं, दुनिया भर में लाखों कामयाब लेकिन कुंवारी महिलाओं को इससे गुजरना पड़ता है। अपनी सहूलियत के लिए मनोवैज्ञानिकों ने इसे ब्रिजेट जोन्स सिंड्रोम का नाम दिया है। यह सिंड्रोम उन सफल और अकेली महिलाओं का पर्याय बन गया है जो कॅरियर के रूप में कामयाब जीवन का भरपूर आनंद ले रही है पर कहीं न कहीं 'मनमुताबिक मीत' की प्रतीक्षा भी कर रही है। उन्हें शादी का इंतजार तो है पर वे इसके लिए बेकरार नहीं हैं।
इस ग्लोबल ट्रेंड के 'इंडिया एडीशन' में ट्विस्ट यह है कि ब्रिजेट जोन्स सिंड्रोम अब केवल महिलाओं पर लागू न होकर पुरुषों पर भी समान रूप से प्रभावी हो गया है। भारत में तेजी से बढ़ती युवा आबादी में कॅरियर को लेकर इस कदर होड़ है कि शादी की औसत उम्र बढ़ती ही जा रही है। अब वे कम से कम मिडिल लेवल एग्जीक्यूटिव की श्रेणी में पहुंचने के बाद ही शादी करना चाहते हैं ताकि भावी परिवार को ठोस आर्थिक मजबूती भी दे सकें। जाहिर है कि 22 साल की आयु तक कोई प्रोफेशनल कोर्स पूरा करने के बाद इतनी तरक्की पाने में 30 की उम्र तो पार हो ही जाती है।
ऐसे युवा तीस पार होने का दबाव जरूर महसूस करते हैं लेकिन प्राथमिकताएं उन्हें शादी के मंडप में बैठने से रोकती हैं। एक विज्ञापन एजेंसी में क्रिएटिव हेड रजत सिन्हा 33 साल के हो चुके हैं और कुवांरे हैं। वे कहते हैं, ''प्यार अंधा होता है लेकिन शादी आंखें खोल देती है। आज की पीढ़ी पर पहले की तुलना में जो दबाव है उसे अभिभावक महसूस नहीं कर सकते। मेरे पिता ने सेवानिवृत्त होने के बाद कार खरीदी और मकान बनवाया लेकिन मेरे लिए इनका मालिक बनने की उम्र पहले आ गई थी। ईएमआई पर ही सही, दुनिया की दौड़ में आगे बढ़ने के लिए यह मेरी जरूरत थीं और यकीनन इसके लिए शादी की जगह कॅरियर पर ध्यान देना पड़ा।'' रजत को शिकायत अपनी जिंदगी से नहीं, बल्कि लोगों की सोच से है, ''40 पार के सलमान खान और राहुल गांधी को आप परफेक्ट बैचलर कहते हैं और हमको अंकल! यह अंतर ही जताता है कि सोसायटी स्टैबलिश्ड लोगों को हर कंडीशन में इज्जात देती है और फिर मैं भी तो यही कोशिश कर रहा हूं।''
यह लॉजिक्स साफ करते हैं कि उम्रदराज संतानों के लिए सही साथी तलाशते अभिभावकों को भले ही पसीना छूटता हो, पर इनकी पेशानी पर बल नहीं है। बैचलर्स की इसी जमात में शामिल टेलीकॉम इंजीनियर उदय मिश्र कहते हैं, ''जरा भावी संतान के पालन-पोषण और पढ़ाई का खर्च ही जोड़ कर देखिए तो आपको मालूम पड़ जाएगा कि सेहरा बांधने से पहले कॅरियर में कामयाबी क्यों जरूरी है?'' वहींउम्र का तैतींसवां बसंत देख चुकीं इवेंट मैनेजर शिप्रा गोयल कहती हैं, ''पैसा तो मैं खुद कमाती हूं पर इंतजार है उसका जो मुझे सच्चा प्यार दे सके। यह इंतजार इसलिए भी जरूरी है क्योंकि शादी गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं है। मैं जिस खूबी से इवेंट्स को मैनेज करती हूं, चाहती हूं कि मेरी जिंदगी का मैनेजर भी उतना ही मैच्योर हो। अधिकतर लोग सोचते हैं कि आत्मनिर्भर लड़कियां डॉमिनेंट होती हैं और मुझे ऐसा मिस्टर राइट चाहिए जिसमें यह रांग थिंकिंग न हो!''

इस प्यार को क्या नाम दें

क्या अच्छे लड़कों का अकाल पड़ गया है, जो लड़कियां बुरे लड़कों को ज्यादा पसंद कर रही हैं? आमतौर पर अच्छे लड़के यही रोना रोते हैं। हाल में हुई एक स्टडी इस बात को और पख्ता करती है कि वाकई लड़कियां बुरे लड़कों के चंगुल में ज्यादा फंसती हैं। असामाजिक या आपराधिक प्रवृत्ति के पुरुष जिंदगी में कुछ और हासिल करें या नहीं, कुछ समय तक के लिए लड़कियों का ध्यान जरूर आकर्षित कर लेते हैं। ऐसा आखिर क्या होता है उनमें?
कैसे जीतते हैं दिल
न्यू साइंटिस्ट मैगजीन के मुताबिक अमेरिकी रिसर्चरों ने 57 देशों में करीब 35 हजार लोगों पर कराए गए सर्वे में नतीजा निकाला कि आक्रामक, कठोर, चालाक और मतलबी किस्म के पुरुष न सि़र्फ लड़कियों से फ्लर्टिग में माहिर होते हैं, बल्कि उनकी सेक्स लाइफ भी अधिक अच्छी होती है। इन नतीजों को हाल ही में जापान के क्योटो शहर में आयोजित 'ह्यूंमन बिहैवियर एंड इवॉल्यूशन सोसाइटी' मीटिंग में पेश किया गया।
इस स्टडी को सही मानें तो ईमानदार, विनम्र, वफादार और सीधे-सादे लड़के लड़कियों की गुड लिस्ट में कम ही हैं। जेम्स बॉन्ड जैसे चरित्र 'बैड ब्वॉयज' को गढ़ने में काफी मदद करते हैं। ऐसे लोग समझौता नहीं करते, स्पष्टवादी होते हैं। जोखिम भरे काम करना इन्हें भाता है। साथ ही ये लड़कियों को लुभाने के सभी गुर जानते हैं। लड़कियों से रिश्ते बनाना इनकी फितरत होती है, लेकिन किसी भी रिश्ते से वे जल्दी ही ऊब जाते हैं और फिर कोई नया रिश्ता तलाशने लगते हैं। ऐसे लोग दोस्तों की पत्नी, बहन या प्रेमिका को भी नहीं छोड़ते। लेकिन ये अच्छे लड़कों की तुलना में बाजी मार लेते हैं?
विपरीत ध्रुवों का आकर्षण
लड़कियां ऐसे लड़कों को पसंद क्यों करती हैं? यह सवाल जटिल है। यहां दो विपरीत ध्रुवों के आकर्षण का सिद्धांत काम करता है। लड़कियां सीधी-सादी राह पर चलने वाली और सुरक्षित माहौल में पलने-बढ़ने वाली होती हैं। एकाएक जब वे बिलकुल विपरीत स्वभाव के किसी लड़के से मिलती हैं तो उससे प्रभावित हो जाती हैं। क्योंकि वह भावनाओं को पढ़ सकता है, लड़की के सामने आत्मविश्वास से भरपूर दिखता है। ऐसा लड़का फिल्मी स्टाइल में लड़की को प्रपोज कर सकता है। यहां तक कि कई बार बलपूर्वक भी उसे प्रभावित करने की कोशिश करता है। चूंकि लड़कियां अपने आसपास या घर में आदर्श छवि वाले पुरुषों के संपर्क में रहती हैं, ऐसे में कोई बिलकुल भिन्न व्यक्तित्व वाला शख्स सामने आता है तो वे उससे प्रभावित हो जाती हैं। कई बार इस खेल में वे अपना दिल भी हार जाती हैं।
सुरक्षा का एहसास
लड़कियों को एक सुरक्षित कवच की जरूरत होती है। उन्हें बाहरी दुनिया असुरक्षित लगती है। ऐसे में अगर कोई पावरफुल व्यक्ति उनका संरक्षक बनकर खड़ा होता है तो वे प्रभावित हुए बगैर नहीं रहतीं। बचपन से वे अपने पिता या भाई के संरक्षण में रहती हैं। पिता या भाई की कठोर छवि उन्हें इस बुरे लड़के में भी दिखती है। इसलिए आक्रामक, क्रोधी और हावी होने वाला पुरुष उन्हें अच्छा लगता है। कहा जाता है कि लड़कियां अपने पिता से और लड़के मां से अधिक प्रभावित होते हैं। अपने अवचेतन में वे पति या प्रेमी में भी वे ही गुण खोजती हैं, जो उनके पिता में होते हैं। बुरे लड़कों की यही क्रोधी व कठोर मानसिकता उन्हें प्रभावित कर लेती है।
जोखिम उठाने की कूवत
मनुष्य कई बार वर्जनाओं को तोड़ना चाहता है। जंगल राज न बन जाए, इसके लिए ही सामाजिक नियम बनाए जाते हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य होता है। लेकिन बुरे लड़कों को ऐसे नियमों की परवाह नहीं होती। वे समाज से लड़ने को तैयार रहते हैं। उनके अपने मूल्य होते हैं और वे खुद के बनाए रास्तों पर चलते हैं। ये बातें भी लड़कियों को आकर्षित करती हैं। इसका एक कारण यह भी है कि वे खुद उन वर्जनाओं को तोड़ने का साहस नहीं कर पातीं। इसलिए भी ऐसे लड़के उन्हें आकर्षित करते हैं।
आकर्षक व्यक्तित्व
यूं तो इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कि बुरे लड़के दिखने में आकर्षक क्यों होते हैं, लेकिन आमतौर पर इनका व्यक्तित्व प्रभावशाली होता है। दरअसल वे अपने आंतरिक सौंदर्य की कमी को बाहरी व्यक्तित्व से पूरा करना चाहते हैं। इसलिए अपनी बाहरी खूबसूरती को वे निखारने की पूरी कोशिश करते हैं। वे स्टाइलिश होते हैं। उनके हाव-भाव, बातचीत के अंदाज और रहस्यवादी व्यक्तित्व के प्रभाव में आ जाती हैं लड़कियां।
क्यों हैं ये लड़कियों के हीरो
एमिटी विश्वविद्यालय, नोएडा में लॉ स्टूडेंट ऋत्विक कहते हैं, 'लड़कियों को ऐसे लड़कों के साथ रहकर सुरक्षा का बोध होता है, साथ ही वे खुद को पावरफुल महसूस करती हैं। कोई उन्हें कुछ नहीं बोलता।'
इसी यूनिवर्सिटी की सिमरन कहती हैं, 'ऐसा नहीं है कि लड़कियां बुरे लड़कों को जीवनसाथी बनाना चाहती हैं। कुछ समय के लिए वे दबंग किस्म के लोगों से प्रभावित हो सकती हैं, लेकिन वे उनके अवगुणों को नजरअंदाज नहीं करतीं। कॉलेज में बैड ब्वॉयज दरअसल उनकी सेफ्टी के लिए जरूरी होते हैं। इसलिए वे उनके साथ घूमना पसंद करती हैं। लेकिन जीवनसाथी के रूप में उन्हें अच्छे और केयरिंग लड़के ही भाते हैं।'
दिल्ली विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन फाइनल इयर की स्टूडेंट तृषा का कहना है, 'लड़कियों को यह भी लगता है कि वे बुरे लड़के को भी बदल देंगी। उन्हें वह इसलिए भी सही लगता है, क्योंकि वह जैसा होता है-वैसा ही दुनिया के सामने भी होता है।'
कॉल सेंटर में काम करने वाले अखिल का कहना है, 'लड़कियां स्वार्थी होती हैं, लेकिन यह स्वार्थ उनकी असुरक्षा से पैदा होता है। बुरे लड़के के साथ रहने से वे कई परेशानियों से बच जाती हैं। वैसे बुरे लड़कों में कुछ गुण आदर्श कहे जाने वाले लड़कों की तुलना में ज्यादा अच्छे होते हैं।'
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीवन पिंकर एक वेबसाइट पर पूछे गए इसी सवाल के जवाब में लिखते हैं, 'ज्यादातर स्त्रियों का पसंदीदा पुरुष वह होता है, जो उनके प्रति उदार और दुनिया के प्रति आक्रामक हो। उन्हें ऐसे लड़कों की स्मार्टनेस और ताकत भाती है। दूसरा बड़ा कारण यह है कि ऐसे पुरुष उन्हें और उनके बच्चों को ज्यादा सुरक्षा देते हैं।
दिल्ली की वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक अनु गोयल कहती हैं, 'ऐसे ज्यादातर मामलों में लड़की को लगता है कि वह लड़के को सुधार देगी, इसे वह एक चुनौती की तरह लेती है। फिल्मों में भी दिखाया जाता है कि प्यार बुरे या आपराधिक चरित्र के व्यक्ति को सुधार देता है। लेकिन प्यार का भूत उतरते ही लड़का भाग जाता है और लड़की की चुनौती धरी रह जाती है।'
क्षणिक होते हैं ऐसे रिश्ते
ऐसे संबंध कितनी दूर तक चलते हैं? इसका उत्तर है-बहुत थोड़ी दूर तक। ऐसे झटपट रोमांस का अंत भी झटपट होता है। कारण यह है कि महज आकर्षण के बलबूते जीवन निभाना आसान नहीं होता है। कोई स्त्री नहीं चाहती कि वह पति या प्रेमी को जेल की सलाखों में देखे। जितनी तेजी से यह आकर्षण पनपता है, उतनी ही तेजी से घृणा में भी बदल सकता है।
इसलिए अच्छे लड़कों को निराश होने की कोई जरूरत नहीं है। पिछली कई स्टडीज ऐसी भी हैं जो यह कहती हैं कि ऐसे आकर्षण की उम्र बहुत कम होती है। लड़कियां खास मकसद के लिए या कुछ समय के लिए ऐसा पार्टनर भले ही चुन लें, जिंदगी जीने के लिए वे ऐसे ही व्यक्ति का हाथ थामती हैं जो अच्छा हो और ताउम्र उनका खयाल रख सकता हो।
प्रेम और अपराध
चा‌र्ल्स शोभराज
सीरियल किलर कहे जाने वाले चा‌र्ल्स शोभराज ने 1974 से 1976 के बीच कम से कम 12 युवा लड़कियों का मर्डर किया। उम्र कैद की सजा काटने वाले इस अपराधी से शादी की 44 वर्ष छोटी एक नेपाली लड़की ने। दिलचस्प बात यह है कि इस शादी का समर्थन किया लड़की की मां ने, जो खुद शोभराज की वकील थीं।
अबू सलेम
अंडरव‌र्ल्ड डॉन अबू सलेम के बारे में कहा जाता है कि उसकी पहली शादी समीरा जुमानी से हुई, जो शादी के वक्त टीनएजर थी। यह शादी नहीं चली। इसके बाद बॉलीवुड ऐक्ट्रेस मोनिका बेदी से उसका विवाह हुआ। आखिरकार बहुत लानत-मलामत के बाद मोनिका भी उससे आजाद हुई।
फिल्मों के ऑब्सेसिव प्रेमी
हिंदी फिल्मों की बात करें तो 'डर', 'बाजीगर' जैसी कई फिल्मों के बुरे नायक बलपूर्वक भी नायिकाओं को अपने प्रेमजाल में फंसाते हैं। हालांकि ऐसी भी कई फिल्में हैं, जिनमें प्यार अंत में अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति को सुधार देता है।

बदला अंदाज किचन का

बदलते दौर में आशियाने ही नहीं, किचन का भी बदल रहा है स्वरूप..
वह दौर था जब आशियाने मेंसिर्फ फ्रंट की खूबसूरती का खयाल रखा जाता था। पर अब गेस्ट रूम, ड्राइंग रूम और बाथरूम की तरह ही किचन भी स्टाइलिश बनाए जा रहे है। किचन महज खाना बनाने की जगह नहीं रह गए, बल्कि स्टेटस सिंबल हो गए है। यहां अब लिविंग रूम में होने वाले फैसले होने लगे है। बच्चों की पढ़ाई, शादी की तैयारी और घूमने जाने का निर्णय भी लिया जाने लगा है।
बढ़ा आकार
कुछ समय पूर्व तक घर की एक छोटी सी जगह को किचन का रूप दे दिया जाता था, लेकिन अब जब किसी स्थान पर खाना बनाने के अतिरिक्त अन्य काम भी होने लगे हों तो आकार बढ़ना भी स्वाभाविक है। स्वरूप नगर की गृहिणी शांति दत्ता बताती है, ''पहले किचन में खाना बनाने, राशन सामग्री व खाना बनाने के बर्तन रखने की जगह होती थी। अब इन जरूरतों के अलावा डाइनिंग स्पेस और गप्पे लड़ाने की जगह का होना भी जरूरी हो गया है, इसलिए किचन का आकार भी बढ़ गया है।''
सामान्य हो सजावट
गृहिणी दीपशिखा वर्मा कहती है, ''अब किचन में खाना बनाने के साथ ही खाना खाने की जगह भी होने लगी है। किचन की सजावट बहुत शांत और संतुष्टि प्रद होनी चाहिए। अधिक बर्तनों का प्रदर्शन, अतिरिक्त सजावट इसके आकर्षण को कम करती है।''
रोशनी का रखें ख्याल
किचन ऐसा हो जो आने वाले मेहमानों को ड्राइंग रूम की तरह अकेलापन महसूस न कराए। मेहमान यहां दाखिल होकर खुद को घर का सदस्य समझे। ये ऐसा होना चाहिए जैसे कोई विशिष्ट स्थान या मेल-मिलाप की जगह है। आर्किटेक्ट विनती अरोड़ा कहती है, ''एक अच्छे किचन में पर्याप्त जगह के साथ ही कैबिनेट, परिवर्तनशील खिड़कियां, स्लाइडिंग डोर आदि होना बहुत जरूरी है। इन्हे लगवाने का चलन इन दिनों जोरों पर है। आजकल लोग ऐसी खिड़कियां लगवाते है, जो परिवर्तनशील होती है। ये जगह को अधिक दिखाने या किसी नई चीज का स्थान परिवर्तन करने के काम आती है। इसी तरह स्लाइडिंग डोर किचन को न सिर्फ बड़े आकार में दर्शाते है, बल्कि पर्याप्त रोशनी का माध्यम भी बनते है। ''
दीवारों का कूल लुक
पालीवाल मारबल्स, यशोदा नगर के संचालक उदय कुमार पालीवाल कहते है, ''किचन की दीवारों का कलर ऐसा होना चाहिए जो मन को सुकून दे। इन दिनों किचन की दीवारों में रचनात्मक टाइल्स लगाने का चलन जोरों पर है। पौधों, फलों व पेड़ों की डिजाइन वाले कूल कलर के टाइल्स न सिर्फ किचन की शोभा बढ़ाते है, बल्कि मन को भी सुकून देते है। ''

बाबा ऐसो वर ढूंढो

अब जीवनसाथी के चयन में लड़कियां दिखा रही है मुखर व्यवहार। लड़कियों की पसंद में सिर्फ बड़ा पैकेज ही नहीं, मैचिंग के दूल्हे भी है..
ड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों की बराबरी कर रही हैं। तकनीक, विज्ञान, साहित्य, खेल और सामाजिक सक्रियता उन्हे 'इक्कीसवीं सदी की लड़की' होने का प्रमाण दे रही है। यही वजह है कि अब रिश्तों के मामले में भी वह पूरी समझदारी से फैसले कर रही हैं। पहले लड़के ही लड़की की शिक्षा, पर्सनॉलिटी, और जॉब पर निगाह डालते थे, लेकिन अब लड़कियां भी अपने भावी जीवनसाथी के मानक तय करने लगी हैं। हां, एक खास बात और है कि वे मां बाप की पसंद से जीवनसाथी के चयन में अपनी जॉब से जुड़े लड़कों को वरीयता दे रही है।
टीचर को चाहिए टीचर
पांडु नगर स्थित कॉनेक्स-ऑन-एच मैरिज ब्यूरो की संचालिका ज्योति गांधी कहती है, ''कुछ वर्षो पूर्व तक लड़कियों के पसंद में बीटेक और एमबीए लड़के होते थे, लेकिन अब बहुत बदलाव आया है। अब लड़कियों की प्राथमिकता में ऐसे दूल्हे होते है जो उनके कार्यक्षेत्र से जुड़े होते है। लड़की यदि एमबीए है तो उसकी प्राथमिकता एमबीए लड़के की ही होती है। इसी तरह होमटाउन में जॉब लगने की संभावना अधिक होने के कारण टीचर लड़की टीचर लड़के को प्राथमिकता में रखती है। उनकी इस पसंद में अभिभावक भी मुहर लगा रहे है। अपनी टीचर बेटी के लिए टीचर लड़का पसंद करने वाले अभिभावक वी.बी. मिश्रा कहते है, ''मैचिंग की शादी में लड़के और लड़की का सिर्फ कार्यक्षेत्र समान नहीं होता, बल्कि पर्सनल लाइफ में भी उनका ताल-मेल बहुत फिट रहता है।''
बराबरी के रिश्ते
गीता मैरिज ब्यूरो की संचालिका गीता त्रिपाठी बताती हैं,''एम.बी.ए., एम.सी.ए., इंजीनियर लड़कों का अब भी क्रेज है, लेकिन थोड़ा अंतर जरूर आया है। अब लड़कियां जीवन साथी के चयन को लेकर मुखर हुई हैं। लड़कियां केवल पैकेज या जॉब ही नहीं, यह भी देखती हैं कि जीवनसाथी उनसे एक कदम आगे है या नहीं। इसमें विशेष तौर से जीवन साथी का खुद से अधिक क्वालीफाई होना प्राथमिकता में शामिल है। वर्तमान में लड़कियां भी एम.बी.ए., एम.सी.ए., बी.टेक. जैसी डिग्रियां ले रही हैं, इसलिए उनकी कोशिश होती है कि लड़का उनसे सुपर हो।''
सरकारी सेक्टर की खास डिमांड
अब लड़कियां ही नहीं, अभिभावक भी सरकारी संस्थानों में कार्यरत लड़कों को अधिक पसंद कर रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह बताती है ब्राम्हण समाज के लिए स्वयंवरम संस्था के माध्यम से नि: शुल्क रिश्ते बताने वाली तिलक नगर की अंजू शुक्ला, ''सरकारी सेक्टर में तेजी से बढ़ी कर्मचारियों की सुविधाओं और वेतन ने सरकारी उपक्रमों में कार्यरत लड़कों की डिमांड एक बार फिर बढ़ाई है। प्राइवेट सेक्टर में भले ही कितना बड़ा पैकेज क्यों न हो, लेकिन वैश्विक बाजार की उथल-पुथल के चलते लोग जॉब को लेकर हमेशा चिंतित रहते है। सरकारी क्षेत्र में जॉब के सुरक्षित रहने की संभावना पूरी बनी रहती है।''
और होगा इजाफा
मैचिंग की शादी करने के बढ़े ट्रेंड पर प्रतिक्रिया देती है समाजशास्त्री डॉ. आरती बाजपेयी, ''मैचिंग की शादी में सबसे अधिक फायदा मिलता है परिवार के साथ रहने और एक कार्यक्षेत्र में काम करने से ऑफिस की कार्यप्रणाली को आसानी से समझने का। इससे वैवाहिक जीवन में सहजता बनी रहने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। कई बार ऐसे मौके भी मिल जाते है जब लड़के और लड़की का एक ही कार्यक्षेत्र होता है तो उनका ऑफिस भी एक होता है जहां दोनों साथ बैठकर काम निबटाते है। आने वाले समय में मैचिंग की शादी के ट्रेड में और इजाफा होने की उम्मीद की जा सकती है।''

रिश्ता रहे सदा के लिए

यह सच है कि मिठास भरा दांपत्य मन में जगाता है संपूर्णता का अहसास। जीवनसाथी से अटूट मोहब्बत ही है इस रिश्ते का आधार, पर कई बार हम दांपत्य की खूबसूरती बरकरार रखने के लिए जरूरी छोटी-छोटी बातें भूल जाते हैं। इतना ही नहीं अपने व्यवहार से अनचाहे ही रिश्ते में उलझनें और मायूसी भी ले आते हैं। दरअसल, कोई भी रिश्ता संपूर्ण नहीं होता। हर रिश्ते को निरंतर सहेजना पड़ता है। जिस तरह हम अपने घर को व्यवस्थित और साफ-सुथरा रखते हैं, ताकि स्वास्थ्य बना रहे, उसी प्रकार रिश्ते को हेल्दी बनाए रखने के लिए भी आपकी ओर से विशेष प्रयास होने चाहिए। समय के साथ आपके रिश्ते में नए अनुभव और नई जिम्मेदारियां जुड़ती हैं। भले ही आप दोनों में कई बातें एक समान हैं, पर यह बात भी ध्यान में रखने वाली है कि आप दोनों अलग-अलग व्यक्तित्व के मालिक हैं। इस रूप में आप दोनों के अपने लक्ष्य हैं, अपनी कुछ इच्छाएं हैं, जिन्हें आप पूरा करना चाहते हैं। कई बार आप दोनों इन सब बातों को देख नहींपाते और यहींसे मतभेद का जन्म होता है। हो सकता है कि आप दोनों पहले एक-दूसरे को जितना समय देते थे, उतना समय अब नहीं दे पा रहे, पर इसका यह अर्थ नहीं कि आप दोनों को एक-दूसरे की फिक्र नहीं है। बात बस इतनी सी है कि आपने यह मान लिया है कि अब आपको रिश्ता बनाने के लिए कोई प्रयास करने की जरूरत नहीं है, पर वास्तव में ऐसा नहीं होता। सच्चाई तो यह है कि यदि आपको बरकरार रखनी है रिश्ते की खूबसूरती तो करने होंगे अतिरिक्त प्रयास। आइए जानें आपकी कौन सी बातों से रिश्तों में घटती है मिठास और क्या हैं उनसे बचने के उपाय:
आलस्य
हर लिहाज से इंसान का दुश्मन है आलस्य। इसकी वजह से आप अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाते। यह आलस्य सिर्फ कॅरियर में ही बाधक नहीं है, बल्कि इससे आपके रिश्ते और जिंदगी भी प्रभावित होती है। समय के साथ दांपत्य भी परिपक्व होता है। आप एक-दूसरे के साथ जितना अधिक समय बिताते हैं, उतना ही निश्चिंत होते जाते हैं। जीवनसाथी को अपने व्यवहार से प्रभावित करने की ललक भी कम होती जाती है, क्योंकि आपको यह विश्वास हो जाता है कि आप दोनों एक-दूसरे को बेइंतहा प्यार करते हैं एवं अब आपका रिश्ता औपचारिकताओं से ऊपर उठ गया है। निश्चिंतता का यही भाव आपको रिश्ते को हर पल बेहतर बनाने के लिए प्रयास करने से रोक देता है। फलस्वरूप आप एक-दूसरे से बोर होने लगते हैं।
उपाय
यदि आपका रिश्ता आपके इस आलस्य से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है तो वक्त आ गया है कि आप दोनों ही सक्रिय हो जाएं। ऐसी चीजें करें, जिससे पार्टनर को यह लगे कि आज भी आप उन्हें लेकर क्रेजी हैं। साथ ही उन्हें भी यह जानने का मौका दें कि आपको क्या पसंद हैं और आपकी उनसे क्या अपेक्षाएं हैं। ऐसी जगहें खोजें, जहां आप साथ जा सकें और मिलकर एंजॉय कर सकें। ऐसे शौक विकसित करें, जिनमें आप दोनों की रुचि हो। अपने उस शौक को मिलकर पूरा करें। इसके लिए बहुत अधिक खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। अगर आप दोनों ही रिश्ते को नई ऊर्जा देना चाहते हैं तो छोटी-छोटी सी चीजें भी आप मिलकर एंजॉय करेंगे।
वाद-विवाद
किसी भी विषय पर वाद-विवाद करने में कोई बुराई नहीं है, पर इसका तरीका क्या है, यह बात मायने रखती है। वाद-विवाद न सिर्फ सामान्य है, बल्कि यह महत्वपूर्ण भी है, क्योंकि आपको और आपके पार्टनर को करीब लाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वास्तव में किसी मुद्दे के पक्ष में या विरोध में मजबूती के साथ अपने विचार रखना ही वाद-विवाद का आधार है। इसके जरिए आप किसी मुद्दे पर अपने विचारों में भिन्नता को जान सकते हैं और इस जानकारी का इस्तेमाल करते हुए एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। इस प्रकार आप एक-दूसरे के विचारों का और अधिक सम्मान कर सकेंगे। यह खेद की बात है कि वाद-विवाद को हम अक्सर नकारात्मक रूप में लेते हैं। जब तक कि आप यह समझ पाएं कि इससे किस प्रकार सकारात्मक नतीजे पर पहुंचा जा सकता है, आपकी बहस लड़ाई-झगड़े का रूप ले लेती है। किसी समझदारी भरे नतीजे पर पहुंचने के बजाय एक-दूसरे को नीचा दिखाना ही आपका मकसद बन जाता है।
उपाय
सबसे पहले तो यह जरूरी है कि आप स्वयं को यह याद दिलाते रहें कि वाद-विवाद होना कोई बुरी चीज नहींहै। यह बात खुद को तब तक याद दिलाते रहें जब तक कि आप इसे भली प्रकार न समझ जाएं, ताकि अगली बार जब आप पार्टनर के साथ बहस में उलझें तो उसे लड़ाई-झगड़े का रूप देने के बजाय किसी सकारात्मक नतीजे पर पहुंचाने का प्रयास करें। किसी मुद्दे पर एक-दूसरे से बातचीत करने से मत कतराएं। याद रखें कि खुले दिमाग के साथ किया गया स्वस्थ संवाद कई समस्याएं हल कर सकता है। इस बात का ख्याल रखना जरूरी है कि वाद-विवाद के दौरान आपका वार समस्या पर होना चाहिए न कि एक-दूसरे पर। बहस के दौरान पार्टनर की नाराजगी के बावजूद यदि कोई सकारात्मक हल निकलता है तो कोई समस्या नहीं है। हां, आपका उद्देश्य पलटकर वार करना या पार्टनर को आहत करना नहीं होना चाहिए।
अनदेखा करने की प्रवृत्ति
समस्या को जानकर भी अनजान बने रहना, मुश्किल का हल नहीं है। हममें से अधिकांश लोग इस यकीन को बनाए रखना चाहते हैं कि सब कुछ ठीक चल रहा है और यदि कोई समस्या है तो अपने आप ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। यह रवैया समस्याओं से मुंह फेरना है। हर रिश्ते में कभी न कभी कुछ समस्याएं पैदा होती हैं, जो हमें तकलीफ देती हैं। उन्हें भुलाकर आप भले ही कुछ देर तकलीफ से दूर रह सकते हैं, पर इस रवैये के साथ आप स्थिति को और भी खराब कर देते हैं। समस्या को अनदेखा करने से वह समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि बढ़ती जाती है। एक समय आता है, जब रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच जाता है। इन समस्याओं को हल किया जा सकता है, पर इसके लिए दोनों पार्टनर द्वारा स्थिति को स्वीकार करना जरूरी है।
उपाय
इस बात को समझें और स्वीकार करें कि आप दोनों एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं, इसके बावजूद आपके रिश्ते में भी कुछ समस्याएं हो सकती हैं। मतभेद होने का यह अर्थ नहीं है कि आप एक-दूसरे से प्यार नहीं करते। यदि कोई समस्या उत्पन्न होती है तो उसके बारे में पार्टनर से बातचीत करें। समस्या से मुंह फेरने पर आप एक-दूसरे से दूर होने लगेंगे। याद रखें कोई भी समस्या स्वत: हल नहीं हो सकती, उसके लिए आप दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे। यदि आप चाहती हैं कि आपके दांपत्य में खुशहाली बरकरार रहे तो यह दिखावा करने की कोशिश कभी न करें कि सब कुछ ठीक चल रहा है। रिश्तों में शर्र्ते नहीं होती। हर रिश्ते में कुछ अच्छी बातें होती हैं तो कुछ कमियां भी हो सकती हैं। दोनों को स्वीकार करते हुए परिस्थितियों को चाहत के अनुकूल ढालने के लिए जरूरी प्रयास करने के लिए तैयार रहें।