बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इशारों ही इशारों में गुजरात के
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा है कि न वह रैम्बो हैं और
न ही छपास रोग से ग्रसित हैं। उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा में जो कुछ
किया जाना चाहिए था, वह किया गया।
पटना में 'जनता के दरबार में मुख्यमंत्री' कार्यक्रम में भाग लेने
के बाद पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आज कुछ लोगों को छपास
की बीमारी है तो ऐसे में क्या कहूं। कुछ लोग कुतर्क पर उतारू हैं। ऐसे
हालात में कुछ बोलने की जरूरत नहीं है।
नीतीश ने कहा कि उत्तराखंड में आई त्रासदी में देश के सभी राज्यों ने सहयोग
किया। बिहार ने भी जहां तक सक्षम हुआ, वहां तक किया गया। उन्होंने कहा कि
वहां की सरकार से समन्वय स्थापित कर बिहार के फंसे लोगों को निकालने की
कोशिश की गई।
नीतीश ने कहा कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से बात कर वहां पर बिहार के
अधिकारी को भेजा गया और समन्वय स्थापित कर सहयोग दी गई तथा फंसे लोगों के
लिए कार्य किए गए। ऐसे में लोगों को कुछ बोलना है तो क्या किया जाए। मैं
अपना काम करता हूं, मुझे छपने का कोई शौक नहीं है।
Tuesday, 2 July 2013
मुंबई में 200 करोड़ रुपये की नकदी और जेवर जब्त
| Indian Cruncy |
आयकर विभाग के एक शीर्ष अधिकारी ने मंगलवा र को बताया कि ये नकदी और जेवरात 150 थैलों में थे, जिन्हें चार टेम्पो में ले जाया जा रहा था। जांचकर्ताओं को इसमें आतंकवादियों की संलिप्तता नजर आ रही। इस सम्बंध में स्थानीय स्तर प 'अंगडिया' के नाम से प्रचलित संदेशवाहकों सहित 47 लोगों को हिरासत में लिया गया है और दोनों एजेंसियों ने मंगलवार सुबह शुरुआती पूछताछ के बाद 20 लोगों को छोड़ दिया। एक सप्ताह पूर्व मिली गुप्त सूचना के आधार पर यह अभियान चलाया गया। इसमें बड़ी मात्रा में धन के इस्तेमाल को देखते हुए एनआईए ने आयकर विभाग की मदद ली। इस धन के आतंकवादियों तक पहुंचने से इनकार नहीं किया जा रहा और हिरासत में लिए गए लोगों से एनआईए अलग-अलग पूछताछ कर रही है। एक अधिकारी ने बताया कि मुम्बई स्थित आयकर विभाग के मुख्यालय में धनराशि की गिनती किए जाने के अलावा जेवरातों की कीमत आंकी जा रही है और इनकी सही कीमत का पता एक या दो दिन में लगेगा।
Monday, 1 July 2013
लंबी यात्रा में हमेशा बैठे न रहें
| big desitnation |
क्या आप अक्सर देश-दुनिया का सफर करते हैं? लंबे समय तक हवाई जहाज की सीट से चिपके बैठे रहते हैं? किताब या वीडियो में सिर डुबोए रहते हैं? मंजिल आने पर ही सिर उठा कर देखते हैं और निकलने के लिए ही खड़े होते हैं? यदि हां, तो यह जानना बेहद जरूरी है कि बार-बार चलना-फिरना कितना आवश्यक है। घंटों सीट से चिपके रहना खतरनाक है। इससे खून के थक्के जमेंगे, जो कई बार तो जानलेवा भी साबित हो सकते हैं। कुर्सी से न चिपके रहें
देश-देशांतर घूमने वाले इस जानकारी से चौंक सकते हैं, पर यह सच है। थक्का जमने की समस्या को डीवीटी (डीप वेन थ्रोम्बोसिस) यानी नस की गहराई में थक्का जमना कहते हैं। टांग या जांघ के ऊपरी भाग में यह समस्या अधिक होती है। लंबे समय कुर्सी से चिपके रहने के बाद उठने के साथ खून के थक्के खून के प्रवाह में बह कर फेफड़ों तक पहुंचते हैं, जो पल्मोनरी इम्बोलिज्म का रूप लेते हैं। पड़ सकता है दिल का दौरा
पल्मोनरी इम्बोलिज्म फेफड़े की मुख्य धमनी या उसकी शाखा का ब्लॉकेज है, जो खून में अन्य हिस्से से आए पदार्थ से होता है। इससे फेफड़ों में खून का प्रवाह या ऑक्सीजन का प्रवाह रुक सकता है और दौरा पड़ सकता है। जानलेवा हो सकता है
समय पर इलाज न हो तो यह जानलेवा है। इसलिए सतर्कता, रोकथाम व जागरूकता जरूरी है। इसमें छाती में दर्द व सांस की तकलीफ होती है। लंबे सफर में बनता है खून का थक्का
शरीर या किसी अंग में लंबे समय तक गति नहीं रहने से खून का प्रवाह बाधित होता है। टांग में एक जगह खून जम जाता है और प्लैटलेट्स आपस में चिपक जाते हैं और खून का थक्का जम जाता है। मुख्य लक्षण
प्रभावित भाग में दर्द, कमजोरी और सूजन होती है। जांच से समय पर पता चल जाए तो उपचार किया जा सकता है अन्यथा थ्रोम्बोइम्बोलिज्म नामक बीमारी हो सकती है, जो जानलेवा है। इसमें थक्का आगे बढ़ते हुए फेफड़ों में अटक जाता है और खून के प्रवाह को बाधित कर देता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के शोध ने बताया कि हवाईजहाज, रेलगाड़ी या सड़क मार्ग से चार घंटे या उससे लंबे समय तक के सफर के दौरान सीट पर बैठे रहने से वीटीई का खतरा है। गतिशून्य होने से नसों में खून स्थिर हो जाता है, जिससे खून के थक्के जम सकते हैं। क्या है उपचार
यह हम सभी जानते हैं कि मसल्स को गतिशील रखने से खून का प्रवाह बढ़ता है। इसलिए यदि आप इस तरह के हवाई सफर किया करते हैं तो एड़ी के जोड़ों के बल पर पैरों को ऊपर-नीचे करते रहें। इससे खून का प्रवाह बढ़ता है और उसका ठहराव नहीं होता है। हवाई जहाज में हर 30 मिनट पर सीट से उठ कर टहल लें। कार से भी लंबे सफर के दौरान बार-बार रुक कर टहल लें। एक अन्य समस्या यह है कि सफर में शरीर में जल की मात्रा बनाए रखने की जगह लोग अक्सर कम या न्यूनतम पानी पीते हैं, ताकि बार-बार वॉशरूम न जाना पड़े, जो गलत है। पहले से दिल की बीमारी हो तो लंबे सफर से पहले अपने डॉंक्टर से परामर्श ले लें और अपने साथ जरूरी दवाइयां भी रख लें। तीन खतरनाक स्थितियां दस्त में अधिक मात्रा में खून आना।
रक्तचाप कम होना, जिसके कारण गुर्दे तक खून नहीं पहुंच पाता और गुर्दे फेल हो जाते हैं।
शरीर में से जब तेजी से पानी की मात्रा कम होने लगती है तो मस्तिष्क में खून का संचार कम होने से रोगी की मृत्यु हो जाती है। तो खतरा दोगुना हो जाता है
2007 में जारी ग्लोबल हैजर्डस ऑफ ट्रैवल पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के शोध में पाया गया कि चार घंटे या उससे अधिक समय तक सफर करने से थक्का जमने का खतरा दोगुना हो जाता है।
ईमानदारी बरतें फिल्मकार : किरण
फिल्म निर्देशिका किरण राव कहती हैं कि फिल्मों में उनके अब तक के अनुभव ने
उन्हें यह सिखाया है कि चलन से अलग हटकर फिल्में बनाने वा
ले फिल्मकारों को
अपने प्रति ईमानदार रहना चाहिए तभी उन्हें पहचान मिल सकती है।
राव (39) ने अपने करियर की शुरुआत एक सहायक निर्देशिका के रूप में फिल्म ‘लगान’ से की थी। उसके बाद उन्होंने ‘मानसून वेडिंग’, ‘साथिया’ और ‘स्वदेस’ जैसी फिल्मों में भी सहायक निर्देशिका के रूप में काम किया। उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘धोबी घाट’ का निर्देशन किया। राव ने बताया कि किसी नए फिल्मकार को दुनिया में हर जगह संघर्ष करना पड़ता है और भारत इससे अलग नहीं है। यहां भी नए फिल्मकार को संघर्ष करना पड़ता है, खासकर जब वह चलन से अलग हटकर फिल्म बनाता है और कुछ अलग करना चाहता है। संघर्ष से बचने का कोई उपाय नहीं है। सबसे अच्छा तरीका है कि आप अपनी पहचान पर कायम रहें और अपने प्रति ईमानदारी बरतें। उन्होंने कहा कि फिल्म को अपनी कहानी खुद कहने दीजिए, क्योंकि यदि आप अपनी फिल्म के लिए उत्साहित हैं, तो यह खुद ही जाहिर हो जाएगा। फिल्म की विशेषता लोगों को आकर्षित करेगी। आप जो भी काम शुरू करते हैं उसमें गुणवत्ता होनी चाहिए, तब आपको लोगों का समर्थन जरूर मिलेगा। आठ साल पहले अभिनेता आमिर खान से विवाह करने वाली किरण राव 'आमिर खान प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड' के बैनर की फिल्मों का काम देखती हैं। हालांकि पारम्परिक मसाला हिंदी फिल्मों में उनकी रुचि नहीं है, फिर भी बॉक्सऑफिस पर फिल्म की सफलता से उन्हें खुशी होती है। उन्होंने कहा कि जब कोई फिल्म अच्छा व्यवसाय करती है, तो पूरे फिल्म जगत के लिए यह अच्छी बात है। मुझे भी फिल्मों की सफलता पर खुशी होती है, लेकिन जब कोई घटिया फिल्म बॉक्सऑफिस पर बेहद अच्छा व्यवसाय करती है तो बुरा लगता है। यह एक फिल्मकार के लिए निराशाजनक है। फिलहाल राव एक नई फिल्म पर काम कर रही हैं और फिल्म की पटकथा लिखने में व्यस्त हैं।
| Kiran Rao |
राव (39) ने अपने करियर की शुरुआत एक सहायक निर्देशिका के रूप में फिल्म ‘लगान’ से की थी। उसके बाद उन्होंने ‘मानसून वेडिंग’, ‘साथिया’ और ‘स्वदेस’ जैसी फिल्मों में भी सहायक निर्देशिका के रूप में काम किया। उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘धोबी घाट’ का निर्देशन किया। राव ने बताया कि किसी नए फिल्मकार को दुनिया में हर जगह संघर्ष करना पड़ता है और भारत इससे अलग नहीं है। यहां भी नए फिल्मकार को संघर्ष करना पड़ता है, खासकर जब वह चलन से अलग हटकर फिल्म बनाता है और कुछ अलग करना चाहता है। संघर्ष से बचने का कोई उपाय नहीं है। सबसे अच्छा तरीका है कि आप अपनी पहचान पर कायम रहें और अपने प्रति ईमानदारी बरतें। उन्होंने कहा कि फिल्म को अपनी कहानी खुद कहने दीजिए, क्योंकि यदि आप अपनी फिल्म के लिए उत्साहित हैं, तो यह खुद ही जाहिर हो जाएगा। फिल्म की विशेषता लोगों को आकर्षित करेगी। आप जो भी काम शुरू करते हैं उसमें गुणवत्ता होनी चाहिए, तब आपको लोगों का समर्थन जरूर मिलेगा। आठ साल पहले अभिनेता आमिर खान से विवाह करने वाली किरण राव 'आमिर खान प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड' के बैनर की फिल्मों का काम देखती हैं। हालांकि पारम्परिक मसाला हिंदी फिल्मों में उनकी रुचि नहीं है, फिर भी बॉक्सऑफिस पर फिल्म की सफलता से उन्हें खुशी होती है। उन्होंने कहा कि जब कोई फिल्म अच्छा व्यवसाय करती है, तो पूरे फिल्म जगत के लिए यह अच्छी बात है। मुझे भी फिल्मों की सफलता पर खुशी होती है, लेकिन जब कोई घटिया फिल्म बॉक्सऑफिस पर बेहद अच्छा व्यवसाय करती है तो बुरा लगता है। यह एक फिल्मकार के लिए निराशाजनक है। फिलहाल राव एक नई फिल्म पर काम कर रही हैं और फिल्म की पटकथा लिखने में व्यस्त हैं।
घनचक्कर: फिल्म रिव्यू
यूटीवी जैसा बड़ा बैनर आजकल हर तरह की फिल्में बना रहा है। मसालों से लबरेज
सिनेमा से लेकर लीक से हटकर गंभीर सिनेमा तक यूटीवी की पैठ है। इमरान
हाशमी और विद्या बालन की प्रतिभाशाली जोड़ी, जो न केवल ग्लैमरस जोड़ी है,
बल्कि इसमें जनता को बांधे रखने की ताकत भी है। ‘आमिर’ और ‘नो वन किल्ड
जेसिका’ जैसी फिल्में बना चुके निर्देशक रा
जकुमार गुप्ता की इस तीसरी फिल्म
का किसे इंतजार न होगा। अमित त्रिवेदी जैसा संगीतकार, जो आज की युवा पीढ़ी
की रगों में फड़कते संगीत की रग-रग से वाकिफ लगता है। अमित भट्टाचार्य
जैसे गीतकार सहित इस फिल्म की पूरी टीम से एक दमदार फिल्म की उम्मीद की जा
सकती है। लेकिन फिल्म ‘घनचक्कर’ के शुरुआती 10 मिनटों में ही ये साफ होने
लगता है कि इस पूरी टीम में फिल्म को लेकर या तो कोई बहुत बड़ा कन्फ्यूजन
रहा होगा या फिर वो एक नए ही तरह का सिनेमा बनाना चाह रहे होंगे, जिसे लेकर
दर्शक अपना टेस्ट धीरे-धीरे डेवलप करेंगे।
मोटे तौर पर फिल्म की कहानी में क्या-क्या होने वाला है, ये फिल्म के प्रोमोज से पहले ही साफ किया जा चुका है। मसलन, एक किरदार है संजू (इमरान हाशमी), जिसने चोरी के पैसे कहीं छिपा दिये हैं और उसकी याददाश्त खो चुकी है। उसके दो साथी पंडित (राजेश शर्मा) और इदरिस (नमित दास) इस इंतजार में हैं कि संजू की याददाश्त वापस आये तो उन्हें अपने हिस्से के पैसे मिलें। संजू की पत्नी नीतू (विद्या बालन) अपने आप में एक दिलचस्प किरदार है। उसके कपड़े पहनने का स्टाइल, बेबाक पंजाबी स्टाइल सब कुछ दिलचस्प है। वह खाना बनाने में फूहड़ है वगैरह वगैरह। अब संजू की याददाश्त वाकई खो गयी है या फिर वो सारे पैसे हड़पने के चक्कर में नाटक तो नहीं कर रहा है। महज इस छोटी-सी बात पर पूरी फिल्म कश्मीर से कन्याकुमारी तक (उदाहरण के तौर पर) सफर तय करती है। सच जानिये जनाब पूरी फिल्म में इन तीन-चार बातों के अलावा और कुछ है ही नहीं और ये सारी बातें आप फिल्म के प्रोमोज में देख ही चुके हैं। गीत-संगीत के साथ इन प्रोमोज का एक बड़ा रूप आपको सवा दो घंटे में देखना है तो जरूर सिनेमा हॉल का रुख कीजिए। इमरान हाशमी जैसे अभिनेता को पूरी फिल्म में दो टुच्चे से दिखने वाले चोरों से पिटते हुए देखना है तो खुशी से ‘घनचक्कर’ की महंगी टिकट खरीदिये और पल्ले न पड़ने वाली कहानी और क्लाईमैक्स के आगे खुद का और अपने पड़ोसी का सिर धुनना है तो जरूर घनचक्कर का दीदार कीजिए, आप स्वतंत्र हैं। दुख और ताज्जुब इस बात का है कि इस फिल्म के प्रोमोज और सितारों से हुई बातचीत ने इस फिल्म के प्रति जो क्रेज पैदा किया था, वह इस फिल्म को देख एक दर्द में तब्दील हो जाता है। इससे पहले दो बेहतरीन फिल्में बना चुके राजकुमार गुप्ता जैसे निर्देशक से वही उम्मीद की जा रही थी, जो इन दिनों अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया या फिर इम्तियाज अली और दिबाकर बनर्जी से की जाती है। फिल्म की कमजोरी उसका ट्रीटमेंट नहीं, बल्कि कहानी और पटकथा है, जिसके आगे इसके चार किरदार बेहद आलसी और ऊबाऊ किस्म के लगते हैं। पंडित और इदरिस हाथ में तमंचा थामने के बावजूद बेहद फनी किस्म के चोर लगते हैं। बैंक डकैती भी किसी फन से कम नहीं है। संजू एक जटिल तिजोरी को किसी सूटकेस की तरह खोल डालता है। इदरिस का अंडरवियर में घूमना, संजू का वाइन पीना, हर छोटी से छोटी बात भूल जाना, नीतू का बेस्वाद खाना बनाना, क्लाईमैक्स में एक भाई साहब नामक किरदार का आना और अंत में ये साफ न होना कि उस पैसे का क्या हुआ आदि तमाम सवाल इस फिल्म को एक उलझन के रूप में पेश करते नजर आते हैं। यह फिल्म डेल्ही बेली बन सकती थी। इसमें फुकरे जैसी सफलता पाने और छा जाने के गुण थे। इसमें एक झलक तेरे बिन लादेन जैसा कटाक्ष करने की भी दिख रही थी, लेकिन ये एक घनघोर सिर दर्द के अलावा कुछ और न बन सकी।
कलाकार: इमरान हाशमी, विद्या बालन, राजेश शर्मा, नमित दास, प्रवीण डबास
निर्देशक: राज कुमार गुप्ता
निर्माता: रॉनी स्क्रूवाला, सिद्धार्थ राय कपूर
संगीत: अमित त्रिवेदी
मोटे तौर पर फिल्म की कहानी में क्या-क्या होने वाला है, ये फिल्म के प्रोमोज से पहले ही साफ किया जा चुका है। मसलन, एक किरदार है संजू (इमरान हाशमी), जिसने चोरी के पैसे कहीं छिपा दिये हैं और उसकी याददाश्त खो चुकी है। उसके दो साथी पंडित (राजेश शर्मा) और इदरिस (नमित दास) इस इंतजार में हैं कि संजू की याददाश्त वापस आये तो उन्हें अपने हिस्से के पैसे मिलें। संजू की पत्नी नीतू (विद्या बालन) अपने आप में एक दिलचस्प किरदार है। उसके कपड़े पहनने का स्टाइल, बेबाक पंजाबी स्टाइल सब कुछ दिलचस्प है। वह खाना बनाने में फूहड़ है वगैरह वगैरह। अब संजू की याददाश्त वाकई खो गयी है या फिर वो सारे पैसे हड़पने के चक्कर में नाटक तो नहीं कर रहा है। महज इस छोटी-सी बात पर पूरी फिल्म कश्मीर से कन्याकुमारी तक (उदाहरण के तौर पर) सफर तय करती है। सच जानिये जनाब पूरी फिल्म में इन तीन-चार बातों के अलावा और कुछ है ही नहीं और ये सारी बातें आप फिल्म के प्रोमोज में देख ही चुके हैं। गीत-संगीत के साथ इन प्रोमोज का एक बड़ा रूप आपको सवा दो घंटे में देखना है तो जरूर सिनेमा हॉल का रुख कीजिए। इमरान हाशमी जैसे अभिनेता को पूरी फिल्म में दो टुच्चे से दिखने वाले चोरों से पिटते हुए देखना है तो खुशी से ‘घनचक्कर’ की महंगी टिकट खरीदिये और पल्ले न पड़ने वाली कहानी और क्लाईमैक्स के आगे खुद का और अपने पड़ोसी का सिर धुनना है तो जरूर घनचक्कर का दीदार कीजिए, आप स्वतंत्र हैं। दुख और ताज्जुब इस बात का है कि इस फिल्म के प्रोमोज और सितारों से हुई बातचीत ने इस फिल्म के प्रति जो क्रेज पैदा किया था, वह इस फिल्म को देख एक दर्द में तब्दील हो जाता है। इससे पहले दो बेहतरीन फिल्में बना चुके राजकुमार गुप्ता जैसे निर्देशक से वही उम्मीद की जा रही थी, जो इन दिनों अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया या फिर इम्तियाज अली और दिबाकर बनर्जी से की जाती है। फिल्म की कमजोरी उसका ट्रीटमेंट नहीं, बल्कि कहानी और पटकथा है, जिसके आगे इसके चार किरदार बेहद आलसी और ऊबाऊ किस्म के लगते हैं। पंडित और इदरिस हाथ में तमंचा थामने के बावजूद बेहद फनी किस्म के चोर लगते हैं। बैंक डकैती भी किसी फन से कम नहीं है। संजू एक जटिल तिजोरी को किसी सूटकेस की तरह खोल डालता है। इदरिस का अंडरवियर में घूमना, संजू का वाइन पीना, हर छोटी से छोटी बात भूल जाना, नीतू का बेस्वाद खाना बनाना, क्लाईमैक्स में एक भाई साहब नामक किरदार का आना और अंत में ये साफ न होना कि उस पैसे का क्या हुआ आदि तमाम सवाल इस फिल्म को एक उलझन के रूप में पेश करते नजर आते हैं। यह फिल्म डेल्ही बेली बन सकती थी। इसमें फुकरे जैसी सफलता पाने और छा जाने के गुण थे। इसमें एक झलक तेरे बिन लादेन जैसा कटाक्ष करने की भी दिख रही थी, लेकिन ये एक घनघोर सिर दर्द के अलावा कुछ और न बन सकी।
कलाकार: इमरान हाशमी, विद्या बालन, राजेश शर्मा, नमित दास, प्रवीण डबास
निर्देशक: राज कुमार गुप्ता
निर्माता: रॉनी स्क्रूवाला, सिद्धार्थ राय कपूर
संगीत: अमित त्रिवेदी
| Ghanchakkar |
| Ghanchakkar |
Ghanchakkar
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Ghanchakkar
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मेरे डुप्लीकेट हैं फरहान : मिल्खा सिंह
राकेश ओम प्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी 'भाग मिल्खा भाग' में फरहान अख्तर ने फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की भूमिका निभायी है। मिल्खा सिंह ने कहा कि अभी हाल ही में इस फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग मेरे लिए रखी गयी थी। मैं मेहरा और फरहान के काम से बेहद प्रभावित हूं।
मिल्खा सिंह ने कहा कि 'भाग मिल्खा भाग' में फरहान ने अच्छा काम किया है। वह इस फिल्म में मेरा डुप्लीकेट लगता है। प्रसून जोशी के लिखे डॉयलग ने भी मुझे काफी प्रभावित किया है। फिल्म के कुछ दृश्यों को देखकर मैं काफी भावुक हो गया था और इसने मुझे मेरे संघर्ष के दिनों की याद दिला दी थी। इस फिल्म ने मुझे विभाजन के बाद उन दिनों की याद दिला दी जब मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी और न ही भोजन की समुचित व्यवस्था थी।
फ्लाइंग सिख ने कहा कि मैं फिल्मों के बारे में बहुत कम जानता हूं। वर्ष 1960 के बाद मैंने कोई फिल्म नहीं देखी है। मैंने राज कपूर की आवारा, श्री 420 और अशोक कुमार की महल देखी है। मेरा पुत्र फिल्मों का बेहद शौकीन है।
उल्लेखनीय है कि राकेश ओम प्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी 'भाग मिल्खा भाग' फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह के जीवन पर आधारित है। इस फिल्म में फरहान अख्तर के अलावा सोनम कपूर की भी मुख्य भूमिका है। यह फिल्म 12 जुलाई को प्रदर्शित होगी।
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