आर्थोग्लाइड नामक इस तकनीक का इस्तेमाल भारत में भी शरू हो गया है। घुटने के क्षतिग्रस्त या बेकार हो जाने की स्थिति में मरीज को सक्रिय जीवन देने के लिये इस समय अकसर घुटने को बदलने का विकल्प अपनाया जाता है, लेकिन आर्थोग्लाइड की बदौलत अब घुटने को बदलने की जरूरत काफी कम हो गयी है।
चिकित्सकों के अनुसार आज के समय में युवाओं में बढ़ते मोटापे, फास्ट फूड के बढ़ते प्रयोग, विलासितापूर्ण जीवन और दिनचर्या से गायब होते व्यायाम जैसे कारणों से कम उम्र में ही हड्डियां एवं जोड़ साथ छोड़ने लगे हैं। फास्ट फूड के बढ़ते इस्तेमाल तथा खान-पान की गलत आदतों के कारण शरीर की हडि्डयों को कैल्शियम एवं जरूरी खनिज नहीं मिल पा रहे हैं। जिससे कम उम्र में ही हड्डियों का घानत्व कम होने लगा है, हड्डियां घिसने और कमजोर होने लगी है।
इसके अलावा युवाओं में आर्थराइटिस एवं ओस्टियो आर्थराइटिस की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। आज देश में घुटने की आर्थराइटिस से पीड़ित लगभग 30 प्रतिशत रोगी 45 से 50 साल के हैं, जबकि 18 से 20 प्रतिशत रोगी 35 से 45 साल के हैं। मुंबई के नानावती अस्पातल के आर्थोपेडिक्स सर्जन डा.संकल्प मुथा के अनुसार आज कम उम्र में ही लोगों को घुटने बदलवाने की जरूरत पड़ने लगी है। लेकिन युवाओं में इस विकल्प को अपनाने में मुख्य दिक्कत यह है कि कृत्रिम घुटने लंबे समय तक नहीं चलते। बाद में दोबारा घुटना बदलवाने की जरूरत पड़ जाती है। ऐसे युवकों के लिये आर्थोग्लाइड तकनीक वरदान साबित हो सकती है। इसमें घुटने को बदले बगैर ही घुटने को नयी ताकत दी जा सकती है और मरीज सामान्य रूप से सक्रिय हो जाता है।
राजधानी दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ आर्थोपेडिक्स सर्जन डा. राजू वैश्य बताते हैं कि शरुआती अवस्था के आर्थराइटिस एवं ओस्टियो आर्थराइटिस से ग्रस्त युवा रोगियों के लिये यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी और महत्वपूर्ण है। क्योंकि इस तरह के डिसआर्डर भारत में घुटने की विकलांगता का सबसे आम कारण हैं।
इस उपकरण को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह प्रारंभिक अवस्था के अस्टियोआर्थराइटिस में क्षतिग्रस्त कार्टिलेज की कार्यक्षमता को बढा़ देता है। यह प्रोस्थेसिस दबाव से राहत देने, जोड़ के अलाइनमेंट को फिर से सही करने और घुटने के बाहर वजन को ठीक से वितरित करने में मदद करता है। आर्थोग्लाइड प्रत्यारोपित करने के लिए सिर्फ दो इंच का चीरा लगाया जाता है और सर्जरी के दौरान लगने वाला यह चीरा करीब दो सप्ताह में भर जाता है और रोगी बहुत जल्द अपना सामान्य कामकाज करने लगता है। डा. वैश्य के अनुसार, घुटने की आर्थराइटिस के 98 प्रतिशत रोगियों में उस भाग में जहां फीमर [जांघा की हड्डी] टिबिया [पिंडली की हड्डी] से रगड़ खाती है, कार्टिलेज की क्षति हो जाती है। ऐसी ही रोगियों में आर्थोग्लाइड का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा आर्थराइटिस की जल्द पहचान होने वाले रोगियों में भी इसका इम्प्लांट फायदेमंद है। लेकिन जोड़ को बहुत अधिक नुकसान होने पर यह प्रक्रिया नहीं की जाती है। यह इम्प्लांट कार्टिलेज के कार्य करने की क्षमता को बढा़ता है।
इस सर्जरी में हड्डियों को काटने की जरूरत नहीं होती। इसलिए इसे एक बहुत छोटे चीरे से आर्थोस्कोपी की मदद से किया जाता है। इससे घुटने की ही में कोई बदलाव नहीं किया जाता है। ऐसे में भविष्य में अगर समस्या बढ़ जाये तो रोगी बाद में घुटना प्रत्यारोपण करा सकता है। आर्थोग्लाइड प्रत्यारोपित करने के लिए सिर्फ दो इंच का चीरा लगाया जाता है और सर्जरी के दौरान लगने वाला यह चीरा करीब दो सप्ताह में भर जाता है और रोगी बहुत जल्द अपना सामान्य कामकाज करने लगता है।
आर्थोग्लाइड कोबाल्ट-क्रोम से बना डिस्क के आकार का एक इम्लांट है जिसे घुटने के जोड़ की उन दो हड्डियों के बीच प्रत्यारोपित किया जाता है, जहां प्राकृतिक कुशन कार्टिलेज के समय पूर्व टूटने-फूटने और घिसने के कारण हडि्डयां एक दूसरे से रगड़ खाने लगती हैं। यह प्रक्रिया यूनीकम्पार्टमेंटल इंटर पोजिशनल आर्थोप्लास्टी कहलाती है। यह घुटना की आर्थराइटिस से पीड़ित रोगियों के लिए एक प्रभावी, कम दर्दनाक और सस्ती शल्य चिकित्सा है, जिसकी शुरुआत हाल ही में की गयी है।
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