शासन और संस्थाओं के कामकाज में व्यापक निराशा और भ्रम की स्थिति का जिक्र
करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि अगले साल के चुनाव एक ऐसी
स्थिर सरकार को चुनने का अवसर देंगे जो सुरक्षा तथा आर्थिक विकास सुनिश्चित
करेगी।
देश के 67वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने संसद और विधानसभाओं में कामकाज की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की और कहा कि भ्रष्टाचार बड़ी चुनौती बन गया है। वस्तुत: मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए मुखर्जी ने अगले साल होने वाले आम चुनावों का जिक्र किया और कहा कि लोकतंत्र का यह महोत्सव हमारे लिए स्थिर सरकार चुनने का अवसर होगा जो सुरक्षा तथा आर्थिक विकास सुनिश्चित करेगी। उन्होंने कहा कि प्रत्येक चुनाव सामाजिक सौहार्द, शांति और समृद्धि की दिशा में हमारे देश की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ने देश को एक और स्वर्णिम युग बनाने का अवसर प्रदान किया है। मुखर्जी ने कहा कि इस अद्भुत अवसर को गंवाना नहीं चाहिए। आगे की यात्रा बुद्धिमता, साहस और दृढ़निश्चय की मांग करती है। हमें अपने मूल्यों और संस्थाओं के व्यापक पुनर्निर्माण के लिए काम करना चाहिए। राष्ट्रपति के मुताबिक, हमें समझना चाहिए कि जिम्मेदारियों के साथ अधिकार होते हैं। हमें आत्म-निरीक्षण और आत्म-संयम के गुण को फिर से खोजना चाहिए। अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने भगवद गीता के एक अंश का उल्लेख किया जिसमें उपदेश दिया गया है, आप जो चुनते हो, वैसा करते हो। मैं लोगों पर अपने विचार नहीं थोपना चाहता। मुझे जो सही लगता है, मैंने आपके सामने रख दिया। अब यह आपके विवेक पर है, आपके निर्णय पर है और आपको तय करना है कि क्या सही है। मुखर्जी ने कहा कि आपके फैसलों पर हमारे लोकतंत्र का भविष्य निर्भर है। राष्ट्रपति ने कहा कि संस्थाएं राष्ट्रीय चरित्र का दर्पण होती हैं। आज हम हमारे देश के शासन में और संस्थाओं के कामकाज में व्यापक निराशा तथा भ्रम की स्थिति देखते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी विधायिकाएं कानून बनाने के मंच के बजाय अखाड़ा ज्यादा दिखाई देती हैं। भ्रष्टाचार बड़ी चुनौती बन गया है। आलस्य और उदासीनता के चलते हमारे देश के समृद्ध संसाधन बर्बाद हो रहे हैं। यह हमारे समाज की गतिशीलता को कमजोर कर रहा है। हमें इस प्रतिगामी रवैये में सुधार की जरूरत है। राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान राष्ट्र की अनेक संस्थाओं के बीच सत्ता संतुलन बनाता है और इस संतुलन को बनाये रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें ऐसी संसद की जरूरत है जो बहस करे, चर्चा करे और निर्णय ले। हमें ऐसी न्यायपालिका चाहिए जो बिना देरी के न्याय करे। हमें ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो देश के लिए प्रतिबद्ध हो और इस तरह के मूल्य चाहिए जो हमें महान सभ्यता बनाते हों। मुखर्जी ने कहा कि हमें ऐसा देश चाहिए जो हमारे सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने की हमारी क्षमता के प्रति विश्वास पैदा करे। हमें ऐसा मीडिया और नागरिकों की जरूरत है जो अधिकारों का दावा तो करें लेकिन समान रूप से अपनी जिम्मेदारियों के लिए प्रतिबद्ध हों। महात्मा गांधी के सहिष्णुता और आत्म-संयम पर आधारित स्वराज के वादे और स्वतंत्रता के वादे का उल्लेख करते हुए मुखर्जी ने कहा कि करीब सात दशकों से हम अपनी तकदीर के मालिक खुद रहे हैं। यह पूछने का वक्त आ गया है कि क्या हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि गांधीजी के विचारों में अनिवार्य रूप से जरूरी प्रयास की गंभीरता, उद्देश्य की ईमानदारी और व्यापक श्रेष्ठता के लिए बलिदान के गुणों को त्याग दिया तो उनके स्वप्न को वास्तविकता में नहीं बदला जा सकता। मुखर्जी ने कहा कि भारत के संस्थापकों ने औपनिवेशिक मरूस्थल में पहला हरियाला बगीचा बनाया और उसे लोकतंत्र से सींचा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र हर पांच वर्ष में मतदान करने के अधिकार से कहीं ज्यादा है। जनता की आकांक्षाओं में इसकी महक है, इसकी भावना नेताओं को उनकी जिम्मेदारियों और नागरिकों को उनके दायित्वों का हर दिन भान कराती है। राष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र एक जीवंत संसद के जरिए सांस लेता है, एक स्वतंत्र न्यायपालिका, एक उत्तरदायी मीडिया, एक चौकस सिविल समाज और ईमानदारी एवं परिश्रम के प्रति वचनबद्ध नौकरशाही। यह जवाबदेही से चलती है, लापरवाही से नहीं। मुखर्जी ने कहा कि इसके बावजूद हमने निरंकुश व्यक्तिगत संपन्नता, असंयम, असहिष्णुता, व्यवहार में अशिष्टता और अधिकारियों के प्रति असम्मान को बढ़ावा दिया। हमारे समाज के नैतिक ढांचे में आई गिरावट का सबसे अधिक प्रभाव युवाओं और गरीबों की उम्मीदों और आकांक्षाओं पर पड़ा। उनके मुताबिक, महात्मा गांधी ने हमें कुछ चीजों से बचने का पाठ पढ़ाया और मैं उन्हें उद्धत करता हूं, सिद्धांतों के बिना राजनीति, कार्य के बिना संपत्ति, अन्तरात्मा के बिना आनंद, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना व्यापार, मानवता के बिना विज्ञान और बलिदान के बिना पूजा। उन्होंने कहा कि आधुनिक लोकतंत्र के निर्माण की दिशा में काम करते हुए हमें उनकी शिक्षा का पालन करना चाहिए। देशभक्ति, करणा, सहिष्णुता, आत्मसंयम, ईमानदारी, अनुशासन और महिलाओं के प्रति सम्मान को जीवन बल का रूप दिया जाना चाहिए।
देश के 67वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने संसद और विधानसभाओं में कामकाज की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की और कहा कि भ्रष्टाचार बड़ी चुनौती बन गया है। वस्तुत: मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए मुखर्जी ने अगले साल होने वाले आम चुनावों का जिक्र किया और कहा कि लोकतंत्र का यह महोत्सव हमारे लिए स्थिर सरकार चुनने का अवसर होगा जो सुरक्षा तथा आर्थिक विकास सुनिश्चित करेगी। उन्होंने कहा कि प्रत्येक चुनाव सामाजिक सौहार्द, शांति और समृद्धि की दिशा में हमारे देश की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ने देश को एक और स्वर्णिम युग बनाने का अवसर प्रदान किया है। मुखर्जी ने कहा कि इस अद्भुत अवसर को गंवाना नहीं चाहिए। आगे की यात्रा बुद्धिमता, साहस और दृढ़निश्चय की मांग करती है। हमें अपने मूल्यों और संस्थाओं के व्यापक पुनर्निर्माण के लिए काम करना चाहिए। राष्ट्रपति के मुताबिक, हमें समझना चाहिए कि जिम्मेदारियों के साथ अधिकार होते हैं। हमें आत्म-निरीक्षण और आत्म-संयम के गुण को फिर से खोजना चाहिए। अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने भगवद गीता के एक अंश का उल्लेख किया जिसमें उपदेश दिया गया है, आप जो चुनते हो, वैसा करते हो। मैं लोगों पर अपने विचार नहीं थोपना चाहता। मुझे जो सही लगता है, मैंने आपके सामने रख दिया। अब यह आपके विवेक पर है, आपके निर्णय पर है और आपको तय करना है कि क्या सही है। मुखर्जी ने कहा कि आपके फैसलों पर हमारे लोकतंत्र का भविष्य निर्भर है। राष्ट्रपति ने कहा कि संस्थाएं राष्ट्रीय चरित्र का दर्पण होती हैं। आज हम हमारे देश के शासन में और संस्थाओं के कामकाज में व्यापक निराशा तथा भ्रम की स्थिति देखते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी विधायिकाएं कानून बनाने के मंच के बजाय अखाड़ा ज्यादा दिखाई देती हैं। भ्रष्टाचार बड़ी चुनौती बन गया है। आलस्य और उदासीनता के चलते हमारे देश के समृद्ध संसाधन बर्बाद हो रहे हैं। यह हमारे समाज की गतिशीलता को कमजोर कर रहा है। हमें इस प्रतिगामी रवैये में सुधार की जरूरत है। राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान राष्ट्र की अनेक संस्थाओं के बीच सत्ता संतुलन बनाता है और इस संतुलन को बनाये रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें ऐसी संसद की जरूरत है जो बहस करे, चर्चा करे और निर्णय ले। हमें ऐसी न्यायपालिका चाहिए जो बिना देरी के न्याय करे। हमें ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो देश के लिए प्रतिबद्ध हो और इस तरह के मूल्य चाहिए जो हमें महान सभ्यता बनाते हों। मुखर्जी ने कहा कि हमें ऐसा देश चाहिए जो हमारे सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने की हमारी क्षमता के प्रति विश्वास पैदा करे। हमें ऐसा मीडिया और नागरिकों की जरूरत है जो अधिकारों का दावा तो करें लेकिन समान रूप से अपनी जिम्मेदारियों के लिए प्रतिबद्ध हों। महात्मा गांधी के सहिष्णुता और आत्म-संयम पर आधारित स्वराज के वादे और स्वतंत्रता के वादे का उल्लेख करते हुए मुखर्जी ने कहा कि करीब सात दशकों से हम अपनी तकदीर के मालिक खुद रहे हैं। यह पूछने का वक्त आ गया है कि क्या हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि गांधीजी के विचारों में अनिवार्य रूप से जरूरी प्रयास की गंभीरता, उद्देश्य की ईमानदारी और व्यापक श्रेष्ठता के लिए बलिदान के गुणों को त्याग दिया तो उनके स्वप्न को वास्तविकता में नहीं बदला जा सकता। मुखर्जी ने कहा कि भारत के संस्थापकों ने औपनिवेशिक मरूस्थल में पहला हरियाला बगीचा बनाया और उसे लोकतंत्र से सींचा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र हर पांच वर्ष में मतदान करने के अधिकार से कहीं ज्यादा है। जनता की आकांक्षाओं में इसकी महक है, इसकी भावना नेताओं को उनकी जिम्मेदारियों और नागरिकों को उनके दायित्वों का हर दिन भान कराती है। राष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र एक जीवंत संसद के जरिए सांस लेता है, एक स्वतंत्र न्यायपालिका, एक उत्तरदायी मीडिया, एक चौकस सिविल समाज और ईमानदारी एवं परिश्रम के प्रति वचनबद्ध नौकरशाही। यह जवाबदेही से चलती है, लापरवाही से नहीं। मुखर्जी ने कहा कि इसके बावजूद हमने निरंकुश व्यक्तिगत संपन्नता, असंयम, असहिष्णुता, व्यवहार में अशिष्टता और अधिकारियों के प्रति असम्मान को बढ़ावा दिया। हमारे समाज के नैतिक ढांचे में आई गिरावट का सबसे अधिक प्रभाव युवाओं और गरीबों की उम्मीदों और आकांक्षाओं पर पड़ा। उनके मुताबिक, महात्मा गांधी ने हमें कुछ चीजों से बचने का पाठ पढ़ाया और मैं उन्हें उद्धत करता हूं, सिद्धांतों के बिना राजनीति, कार्य के बिना संपत्ति, अन्तरात्मा के बिना आनंद, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना व्यापार, मानवता के बिना विज्ञान और बलिदान के बिना पूजा। उन्होंने कहा कि आधुनिक लोकतंत्र के निर्माण की दिशा में काम करते हुए हमें उनकी शिक्षा का पालन करना चाहिए। देशभक्ति, करणा, सहिष्णुता, आत्मसंयम, ईमानदारी, अनुशासन और महिलाओं के प्रति सम्मान को जीवन बल का रूप दिया जाना चाहिए।
No comments:
Post a Comment