पद्मा जी आपने अपने बलबूते अपनी पहचान बनाई है और हमारा यह स्तंभ ऐसी ही स्त्रियों के बारे में है..
हां, लेकिन मुझसे पहले जिन स्त्रियों ने हमारे लिए यह राह हमवार की, जिन्होंने संघर्ष करके हमारे लिए रास्ते बनाए, मैं सबसे पहले उन्हें प्रणाम करती हूं। देखिए, मैं डोगरी की पहली कवयित्री हूं। मेरी पहचान इसी से है। कई लोग लिख रहे हैं। लडकियां कहानियां भी लिख रही हैं, लेकिन कविताओं में अभी तक तो उस मयार की कोई स्त्री नहीं है।
आपके पिता संस्कृत के विद्वान थे, फिर आपने लिखने के लिए डोगरी को क्यों चुना?
हम लोग डोगरा हैं। मेरे पिता प्रो. जयदेव शर्मा राजपुरोहित थे। संस्कृत के विद्वान थे, उन्होंने लाहौर से डबल एम.ए. एल.एल.बी. किया था। अपने घर में मैं सबसे बडी हूं। मेरे बडे भाई यानी ताऊजी के बेटे संस्कृत बोलते थे, बल्कि कहूं कि घर में संस्कृत में ही आपसी बातचीत होती थी। मेरी भाभी जब मायके से दूसरी बार ससुराल आ रही थीं तो उस समय की परंपरा के अनुसार पंडित श्लोक पढकर दुलहन को विदा कराते थे। ऐन समय पर पंडित जी नहीं आए तो मेरी बुआ ने श्लोक पढे। अगर हालात अच्छे होते तो शायद मैं भी पंडित बनती। लेकिन स्त्री के लिए यह काम आज भी मुश्किल है, तब की बात तो अलग थी। दस-दस मील दूर जाना..घोडे या पालकी पर.., यह मुश्किल था। वैसे स्त्रियों के लिए आज का समय ज्यादा बुरा है। उस समय तो अगर कोई लडका हमें कुछ कह देता था तो हमारे मुहल्ले के लडके उसे पीट देते थे। आज की तरह माहौल नहीं था।
हमने सुना है कि बचपन में आप पिता के साथ संस्कृत के श्लोक भी पढा करती थीं..।
हमने बोलना शुरू ही किया था, तभी पिता जी ने संस्कृत के श्लोक सिखा दिए थे। वे तब मीरपुर कॉलेज (अब पाकिस्तान) में प्रोफेसर थे। अब वहां मंगला डैम बन गया है। पिता जी के पास 20-30 लडके हर समय पढते थे, जिसका वह कभी पैसा नहीं लेते थे। वह कहते थे कि हम ब्राह्मण हैं, शिक्षा देने के पैसे नहीं ले सकते। यह 1950 के आसपास की बात है। मेरी पैदाइश 1940 की है। (याद करते हुए) हम जम्मू में थे उस वक्त। पिता मुझे और मेरे छोटे भाई आशुतोष को सुबह पार्क में ले जाते। हम संस्कृत के श्लोक पढते तो लोग हमें सुनने आ जाते। मेरा उच्चारण बहुत साफ था, हालांकि छोटा भाई अस्फुट सा पढता था। वे श्लोक मुझे आज भी याद हैं। पहले मेरे पिता कश्मीर असेंबली में किसी पद पर थे। ..तब ऐसी भागदौड नहीं थी। परिवार का सिस्टम था, हम कभी अकेले नहीं होते थे, हमारे दुख-सुख साझा थे। मैं सिर्फ जयदेव शर्मा की ही बेटी नहीं थी। सबको यह खयाल था कि जयदेव की बेटी उन सबकी बेटी है। आज परिवार बिखर गए हैं..।
पिता का प्रभाव आप पर गहरा दिखता है..
हां-। दुर्भाग्य से वह हमारे बीच ज्यादा समय नहीं रहे। वर्ष 1947 में उनका ट्रांस्फर जम्मू हुआ। वह वहां से जॉइन करके बस से वापस घर आ रहे थे। एक अन्य व्यक्ति जीप से आ रहे थे, जो पिता के परिचित थे। जीप में 25 लाख रुपये थे। उन्होंने पिता से कहा कि पंडित जी, आप मेरी जीप में ही आ जाएं। जीप में एक अन्य लडकी भी बैठी थी। पैसों के बारे में कुछ चोरों को खबर थी। उन्होंने जीप पर गोली चला दी, एक गोली पिता को और दूसरी उस लडकी को लगी..।
..ऐसी हालत में किसने आपके परिवार को सहारा दिया?
खबर सुनते ही मेरे ताऊजी 40 किलोमीटर दूर गांव पुरमंडल से वहां आ गए थे। उस समय हम लोग साल भर का अनाज घर में जमा करके रखते थे। यह जगह शिव मंदिर के लिए जानी जाती है। कहा जाता है कि वहां शिव की खुद निकली हुई मूर्ति है। फिर हम गांव चले गए। मां तब प्रेग्नेंट थी। वह हर समय रोती रहती थी। हमारा घर पहाडी पर था, गांव की औरतें आतीं और रोने लगतीं। मैं एक साल के छोटे भाई को घर के पिछवाडे लेकर चली जाती ताकि वह न समझ सके कि हमारे पिता अब नहीं रहे। घर में गायें-भैंसे थीं। अनाज, दूध-दही-लस्सी सब था। लेकिन मुझे लग गया कि अब हम पहले जैसे नहीं रहे..।
क्या इसी खालीपन ने आपको लेखन की ओर प्रेरित किया?
हां, पिता के जाने के बाद मैंने गांव का जीवन करीब से देखना शुरू किया। तब वहां औरतें लोकगीत गाती थीं। यहां एक विधा है गाने की, पांखा, यह जम्मू के अलावा कहीं और नहीं है। लोकगीतों से मैं चमत्कृत थी। पिता के जाने के बाद एक खालीपन आ गया था। जब वह थे तो मैं चाहती थी कि खूब पढूं, प्रथम आऊं ताकि लोग पिता को बधाई दें, लेकिन उनके जाने के बाद इस ओर रुचि कम हो गई। मन लोकगीतों में रमने लगा। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि डोगरी लोकगीत विलक्षण होते हैं। यह सच बात है। नवरात्र में हम व्रत रखते थे, कीर्तन करते थे। मैं बहुत अच्छी ढोलक बजाती थी, आज भी बजाती हूं। हम माता की भेंटे गाते थे जहां भी कोई भूल जाता, मैं चंद पंक्तियां जोड देती और गीत बढता जाता। मेरी उम्र 10-11 की रही होगी, लेकिन लिखना बस यहीं तक सीमित था। क्योंकि तब मुझे लगता था कि लिखने की भाषा हिंदी है। तीसरी-चौथी कक्षा के बाद मैं जम्मू आ गई। वहां स्कूल में गाई जाने वाली प्रार्थना भी मेरी ही लिखी होती थी। पांचवीं के बाद एक दूसरे स्कूल में मेरा दाखिला हुआ। यहां से लगा कि नहीं अब कुछ करना होगा। मैं काफी पॉपुलर थी। मॉनिटर भी थी। बीमार होती तो हेडमिस्ट्रेस मेरे घर मुझे देखने आ जाती थीं।
आपने अपनी पहली कविता 14 वर्ष की उम्र में लिखी। कविताओं के लिए किसने प्रोत्साहित किया आपको?
टूट जाते हैं कभी मेरे किनारे मुझमें
डूब जाता है कभी मुझमें समंदर मेरा..।
इस एक शेर में लेखन की पूरी प्रक्रिया समाई हुई है। देखिए, हम सबके भीतर यादों का अथाह समंदर होता है। किसी से प्यार करने का, नफरत का, रिश्तों का बडा सा समंदर हमारे भीतर समाया रहता है। मैं प्रकृति के करीब थी.., प्रकृति ही मेरी प्रेरणा थी। पिता के साथ हमने कश्मीर की खूबसूरती के कई नजारे लिए थे। श्रीनगर में उनकी पोस्टिंग थी तो वह हमें हर संडे निशात, चश्माशाही, शालीमार जैसे सारे बागों की सैर कराते। उन दिनों की यादें मेरे जेहन में हैं। आज वह कश्मीर नहीं रहा, लेकिन मैंने उस कश्मीर को अपनी यादों में जिंदा रखा है। मैं जेहनी तौर पर हमेशा जम्मू-कश्मीर में रहती हूं, बस शरीर दिल्ली में है मेरा।
आपने कहा कि तब लडकियों का बाहर निकलना मुश्किल था, तो आपके लिए आगे बढना कैसे संभव हुआ?
आठवीं कक्षा में थी, उन दिनों नया-नया रेडियो आया था। नई प्रतिभाओं की खोज हो रही थी। मैं हर रविवार रेडियो में कार्यक्रम करती। एक बार बोलने के 20 रुपये मिलते थे मुझे। वह बहुत ज्यादा होते थे, मुझसे खर्च नहीं होते थे, 15 तो मां को पकडा देती, बाकी में से भी बस 2-3 रुपये खर्च कर पाती..। दसवीं के बाद कॉलेज आई तो तब तक मैं मशहूर हो चुकी थी। वर्ष 1955 में एक बडा मुशायरा हुआ, जिसके ऑर्गेनाइजर्स में मेरी सहेली के भाई दुष्यंत रामपाल भी थे। उन्होंने मुझे कविता पढने को कहा.. इस तरह शुरुआत हो गई। लेकिन इसी बीच मैं बीमार हो गई, मुझे ट्यूबरकुलोसिस हो गया। लगभग तीन साल हॉस्पिटल में रही, बचने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन बच गई..। खैर.., मैं तब सेकंड ईयर में ही थी। रोजी-रोटी भी कमानी थी तो रेडियो में इंटरव्यू देने गई। मुझे बोलने को कहा गया और मैंने बोलना शुरू किया तो बीच में ही मुझे रोक दिया गया। आउटस्टैंडिंग कैटेगरी में मेरा सेलेक्शन हुआ था। मुझे पांच भाषाएं आती थीं, पंजाबी, डोगरी, हिंदी, उर्दू, कश्मीरी..। अंग्रेजी कम आती थी, अब भी कम बोलती हूं..। इसी बीच सरदार जी से मेरा परिचय हुआ। सिंह बंधुओं में से छोटे भाई सुरिंदर जी से मैंने शादी की..। (यादों में खोते हुए) मुझे याद है कि मेरे छोटे भाई ने कहा था कि हम दोनों शादी नहीं करेंगे और छोटे भाई को इंजीनियर बनाएंगे। बहरहाल मैंने शादी कर ली..।
पति का कितना सहयोग मिला आपको?
पति ने हमेशा प्रोत्साहित किया। कभी रोका-टोका नहीं। उनमें एक ही अवगुण है कि वह गुस्सैल हैं। मेरी बीमारी के दौरान ये अपने प्रोग्राम कैंसिल कर देते थे। सारे पैसे इन्होंने मुझ पर खर्च कर दिए ताकि मैं जिंदा रह सकूं। सारे दिन अस्पताल में रहते..। बहुत भले इंसान हैं। मैं उनका बहुत सम्मान करती हूं। इतनी बीमारियों के बाद भी आज अगर मैं जिंदा हूं तो बस इन्हीं के कारण।
आपने कविताएं ज्यादा लिखीं। क्या फर्क है प्रोज और पोएट्री में? कौन सी विधा ज्यादा मुश्किल है?
देखिए, कविता खुद आती है मन में, उसे लिखना नहीं पडता। लेकिन गद्य में मेहनत करनी पडती है। इसे लिखना पडता है। वैसे मैंने हिंदी में भी बहुत लिखा है। इसमें चार नॉवल हैं, कुछ मैटर अभी छपने को तैयार है, बस लिखे हुए को व्यवस्थित करना है। यात्रा-संस्मरण हैं। इसके अलावा मैंने 12-14 किताबों का अनुवाद भी किया है। अनुवाद के कई बडे अवॉर्ड मुझे मिले हैं। डोगरी में मेरी नौ किताबें हैं। दो नॉवल हैं। मेरी आत्मकथा भी तीन भाषाओं में है। डोगरी, हिंदी और अंग्रेजी में। हिंदी में सबसे पहले प्रकाशित हुई। साक्षात्कारों की तीन पुस्तकें हैं, चौथी तैयार है..।
आपके पति बडे गायक हैं। क्या संगीत में आपकी रुचि थी?
वह महान गायक हैं। लेकिन पहले मुझे यह बात मालूम नहीं थी। शादी हुई तो मैंने इनसे कहा कि तुम कितना भी अच्छा गाओ, मेरी जैसी ढोलक नहीं बजा सकते। खैर, बाद में मुझे पता चला कि वह तो बडे शास्त्रीय संगीतकार हैं। सुबह-सुबह रियाज करते हैं, तो घर का माहौल बेहद शांत हो जाता है..। शास्त्रीय संगीत में यह ताकत है कि यह मन को बेहद सुकून देता है।
लेखन, गायकी और परिवार के बीच तालमेल कैसे बिठाया?
मेरे पास काफी समय था। मेरी बेटी 37 वर्ष की आयु में पैदा हुई। पति ने मुझे बहुत सपोर्ट किया। सास भी बहुत भली थीं। वह मुझसे बहुत प्यार करती थीं। मैं सरदारजी से कहती थी कि शादी के पहले कुछ बरस तो सास की वजह से निकल गए, फिर बेटी की वजह से और अब तो हम बूढे हो गए हैं..। (हंसते हुए) लेकिन वह बहुत भले इंसान हैं। मेरे लिए हर इंतजाम उन्होंने कर रखा है। कहीं भी आना-जाना चाहूं, गाडी-ड्राइवर सब मेरे लिए है।
आप कितनी धार्मिक हैं? आपने मंदिर का जिक्र किया था?
हां, जब मुंबई में थी तो सोमवार का व्रत रखती थी और मंदिर भी जाती थी। अब इस दौर में अपने जीवन से खुश हूं। मौत के बारे में नहीं सोचती, जब आएगी तब आएगी। मैं सरदार जी से कहती हूं, मैं जब तक नहीं चाहूंगी, मौत नहीं आएगी। हां, सुबह थोडी पूजा कर लेती हूं (हंसते हुए)। ऊपर जाना है तो थोडा राब्ता रहना चाहिए न..! वहां जाऊं तो लोग पहचान लें, दुआ-सलाम कर लें। (देर तक हंसते हुए)
आपको इतने अवॉर्ड मिले। आपने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। अपनी पहचान बनाने का सुख क्या है?
बहुत बडा सुख है। कोई यह नहीं कह सकता कि पद्मा को उन्होंने बनाया। मैंने खुद अपनी राह बनाई। हालांकि ऐसे लोग भी थे जिनका हाथ मेरे सिर पर था। दिनकर जी, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम जैसे तमाम लोगों का साथ था। डोगरी पहले कभी पठानकोट से बाहर नहीं निकली थी। मैंने उसे साहित्य जगत में खास स्थान हासिल कराया। एक स्त्री जन्म देने की पीडा से गुजरती है और फिर उसका सुख पाती है। बिलकुल ऐसा ही है सृजन का सुख। अभी तो मेरे बहुत से काम बाकी हैं, उन्हें पूरा करने में जुटी हूं..। बहुत कुछ है बिखरा हुआ, व्यवस्थित करना है..।
लता मंगेशकर जैसी महान गायिका ने आपके डोगरी के गीत गाए हैं। आपने एक किताब भी लिखी है उन पर..? कैसे हुआ उनसे परिचय?
इसकी भी एक कहानी है। मुंबई में हम पैडर रोड पर रहते थे। सामने एक शिव मंदिर था, सोमवार को मैं वहां जाती थी। जम्मू में मेरे एक परिचित थे, जो लता दीदी के भाई हृदयनाथ मंगेशकर के दोस्त थे। एक बार जम्मू गई तो उन्होंने पूछा, मुंबई में कहां रहती हो? मैंने बताया तो उन्होंने कहा बाला से मिली हो? मैंने कहा कौन बाला? यह बाला हृदयनाथ थे। फिर उन्होंने मुझे एक पोटली दी कि जाकर उन्हें दे दूं। मैं लता दीदी के घर गई तो उनका कुक सखाराम आया और कहा कि वही पोटली दे देगा। मैंने कहा, नहीं, मैं खुद दूंगी। इतने में मीना दीदी (लता दीदी की छोटी बहन) आ गई। उन्होंने कहा, वह बाला को जगा देंगी। इस तरह हृदयनाथ जी से मुलाकात हुई। वह बहुत गर्मजोशी से मिले। मैंने धीरे से उनसे कहा कि मैं लता दीदी से मिलना चाहती हूं। इस पर उन्होंने कहा कि मैं उनसे बात करूंगा, वह आपसे जरूर मिलेंगी। इतने में ही दरवाजे पर लता दीदी आ गई। कॉटन की साडी में लिपटी..। मैंने उनके पैर छुए। उन दिनों दीदी से मिलना असंभव सा था। इस घटना के बाद पांच-छह दिन मुश्किल से निकले। घर में मेरी सास थीं, वह मुझे बहुत प्यार करती थीं, बहुत सहृदय महिला थीं। उनसे मैंने इजाजत ली और लता दीदी से मिलने गई। लता दीदी बहुत प्यार से मिलीं। मेरी आदत है कि सबसे बेतकल्लुफी से मिलती हूं। दीदी के सामने मैंने अपना दिल खोल कर रख दिया। उन्हें अपने बारे में सब कुछ बताया। उन्होंने मुझसे कहा, जब भी मेरा मन करे, मैं उनसे मिल लूं। तब से मैं उन्हें बडी दीदी कहती हूं। मैंने उनसे कहा, दीदी मैं चाहती हूं कि आप मेरे डोगरी के गीत गाएं। यह समय तीन-चार साल बाद आया। मैंने उनके साथ कम से कम 1000 रिकॉर्डिग्स अटेंड की हैं। उन पर एक किताब लिखी है हिंदी और मराठी दोनों में है यह। हिंदी में उसका शीर्षक है-ऐसा कहां से लाऊं। यह पंक्ति मिर्जा गालिब के एक शेर से ली गई है।
.. पांच हजार रुपये लगे थे उस रिकॉर्रि्डग में। कंपनी इस पर पैसा नहीं लगाना चाहती थी, क्योंकि उन्हें यह भरोसा नहीं था कि ये गीत चलेंगे या नहीं। ..इसी बीच मुझे साहित्य अकादमी अवॉर्ड मिला। सरदारजी ने कहा, तुम चिंता मत करो, मैं पैसा लगाऊंगा, तुम रिकॉर्डिग करो। वे गीत सुदूर पहाडों तक पहुंचे। लाखों कमाए कंपनी ने, लेकिन हमें रॉयल्टी का एक पैसा नहीं दिया गया..।
मुंबई से फिर दिल्ली कैसे आ गई?
मेरी बेटी मीता (मनजीत) को मुंबई की हवा सूट नहीं करती थी। उसकी सेहत वहां ठीक नहीं रहती थी, इसलिए डॉक्टर के कहने पर मुझे दिल्ली आना पडा। उस समय मुंबई में इस्मत आपा (इस्मत चुग्ाताई), ऐनी आपा (कुरुर्तल-एन-हैदर), राजिंदर सिंह बेदी जैसे बडे-बडे उर्दू लेखक थे। उनकी संगत छोड कर दिल्ली आना अखर रहा था। लेकिन आना पडा। दिल्ली में साहित्य अकादमी से जुडी, अभी भी मैं जनरल कौंसिल की मेंबर हूं। सक्रियता कुछ कम हुई है, लेकिन काम तो करती हूं।
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